Thursday, April 21, 2011

बाघा सीमा पर एक शाम
अमृतसर से 28किमी दूर भारत पाक सीमा बाघा पर होने वाली सैनिक परेड को देख मन प्रसन्न हुआ। देशप्रेम और भाईचारे का सन्देश देती इस परेड को निहारने वाले दोनों देश के लोग किसी मायने में एक दूसरे के दुश्मन नजर नहीं आए।
हमारी देश के सीमा सुरक्षा बल के सैनिक और पाक के रेंजर एक लय और ताल में परेड कर अपने अपने राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान दे रहे थे। दोनों देश के लोग तालियाँ बजाकर स्वतःस्फूर्ति देशप्रेमपरक सांस्कतिक  आयोजन  का तुत्फ ले रहे थे।
बाघा सीमा पर इस रंगारंग व विलक्षण आयोजन का प्रचलन पुराना है दोनों देशों के हजारों लोग प्रतिदिन बाघा सीमा पर इकट्ठे होते हैं तब किसी के हृदय में एक दूसरे के प्रति घृणा की भावना पैदा नहीं होती बल्कि हम सोचने पर मजबूर होते हैं कि भारत जैसे देश का बटबाराा 1947 में क्यों हुआ। यदि शातिर  अंग्रेजों के कारण ऐसा हुआ तो अब हम अमन-चैन से क्यों नहीं रह पाते। क्यों भारत-पाक युद्व हुआा क्यों कारगिल की लड़ाई हुई। क्यों मुंबई पर आतंकी हमला होता है और क्यों संसद पर हमला और क्यों नहीं सुलझने का नाम ले रही कशमीर की समस्या!
सीमा पर पहुंचने के लिए लगाए गए प्रवेश द्वार को पार करते वक्त एक बस ने हार्न बजाया। अरे यह क्या! यह बस लाहौर-दिल्ली के बीच चलने वाली बस थी। यह बस सेवा 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के समय में प्रारम्भ हुई थी। इस सेवा के प्रथम दिन का सीधा प्रसारण दूरदर्शन पर मैं मथुरा में अपने घर पर देख रहा था।  टीवी पर लाइव प्रोग्राम देख मेरी आंखे नम हो गई थीं। अटल जी ने लाहौर जाने वाली बस को हरी झण्डी दिखाई थी। मुझ पर रूका नहीं गया और एक कविता अटलजी के इस अच्छे प्रयास को समर्पित कर दी। यह बात अलग है कि उन्ही के काल में कारगिल की लड़ाई हुई तो अटलजी का व्यक्तित्व सवालिया निशानों से घिर गया।
कविता इस प्रकार है
- अटल तुम्हारे  चरण कहाँ है, छूने को मन करता है
   सरहद के उस पार खड़े तुम, जनजन वन्दन करता है।
पाँच दषक की घृणा-वितृष्णा, छूमंतर क्षंणभर में कर दी
ज्ञान ज्योति गौतम गांधी जी, सबके जनमानस में भर दी।
बस बस बहुत हो चुका कहकर, जाकर सरहद पर बस कर दी
इस बस में अब फूल खिलेंगे, अपनेपन की खुषबू भर दी
उज्जवल यह आचरण तुम्हारा, कलुष हृदय का हरता है
अटल तुम्हारे चरण कहां है छूने का मन करता है
बन्द पड़ी इस सीमा पर अब बस के पहिए गुजरेंगे
सूने पड़े हाषियों पर भी मंगल स्वास्ति चिन्ह उभरेंगे
बन्दूकें फेंकी जाएंगी, सुमन शांति के मुस्कायेंगे
भाई-भाई रहे, रहेंगे सारे जग को बतलायेंगे
षान्ति संकल्प तुम्हारा मन में दीपक आषा के धरता है
अटल तुम्हारे चरण कहां है छूने को मन करता है
बर्लिन की दीवार बना था, अविष्वास अब ढहता है
हाथ मिल ेअब गले मिलेंगे, मन अपना यह कहता है
आरोपों का अन्त हुआ अब, सब जनमानस उत्साहित है
दोषारोपण खत्म हुए लो, शुभ पंथ आलोकित है।
सुंखद शांति परचम लहराया, यष हर और बिखरता है
अटल तुम्हारे चरण कहां है, छूने को मन करता है

Friday, September 10, 2010

बन्दूक का सिपाही बना कलम का सिपाही

बन्दूक का सिपाही बना कलम का सिपाही




अशोक बंसल



देश में शासन-प्रशासन की दुर्व्यवस्था और जन प्रतिनिधियों के अनाचारों पर यदि एक साधारण पुलिसकर्मी कलम चलाए तो हैरत तो होगी ही। पुलिसकर्मी सुरेश चाहर ने ऐसा ही किया है। मथुरा में सिपाही से सबइंस्पेक्टर बना सुरेश हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत में एम.ए. है और पिछले दिनों हिन्दी में पीएचडी कर उसने अपनी अध्ययनशीलता का परिचय दिया है। हैरत इस बात की भी है कि एक हाथ में बन्दूक और दूसरे में कलम थामने वाले सुरेश की पीठ थपथपाने वाला कोई नहीं।



आगरा जिले की किरावली तहसील के 38 साल के सुरेश ने बताया कि किसान का बेटा होने के कारण उसने 1992 में पुलिस में सिपाही की नौकरी शुरू की। उसे बचपन से पढ़ने लिखने का शौक था। मथुरा में विभिन्न स्थानों पर सिपाही के रूप में तैनात रहते उसने अध्यापकों से संपर्क रखा और हिन्दी अंग्रेजी, संस्कृत में एम.ए. की परीक्षा देता रहा और पास होता रहा। सुरेश ने बताया कि मथुरा के के.आर.डिग्री कॉलेज के हिन्दी के प्रो0 रमाशंकर पाण्डेय और डॉ.अनिल गहलौत की प्रेरणा से उसने पी.एच.डी डिग्री के लिए काम शुरू किया। तीन वर्ष में वह सुरेश से डॉ0 सुरेश हो गया।



हिन्दी में प्रेमचन्द और अंग्रेजी में मिल्टन को पसन्द करने वाले सिपाही सुरेश ने बताया कि उसे पढ़ने लिखने का शौक अवश्य है लेकिन अपनी नौकरी में कभी कोई लापरवाही नहीं बरती। यह बात अलग है कि पुलिस की नौकरी में उसे दिलचस्पी नहीं और वह किसी कॉलेज में प्रोफेसर बन अध्ययन-अध्यापन में लगना चाहता है।



सुरेश अपनी विभागीय परीक्षा पासकर अब सबइन्सपेक्टर है और तैनाती पड़ोसी जिला हाथरस कोतवाली में है। उसने बातया कि पुलिस की नौकरी में रहते उसे जीवन और समाज को जानने का अच्छा मौका मिला है। इसका सदुपयोग उसने ‘तपस्या’ उपन्यास लिखकर किया है। सुरेश के गुरू मथुरा के.आर. कालेज के प्रोफेसर अनिल गहलौत ने बताया कि सुरेश उनके संपर्क में काफी अरसे से है। साहित्य के प्रति एक सिपाही का अनुराग देख कर वह खुद अचम्भे में हैं। ‘तपस्या’ उपन्यास उसकी लगन और ईमानदार सोच का नमूना है। डा0 अनिल ने बताया कि पिछले दिनों उनका प्रोफेसर मित्र छठे बेतन आयोग के लागू होने पर एरिअर के रूप में अच्छी रकम मिलने पर रिवाल्वर खरीदकर लाया था जबकि सुरेश अपना पहला वेतन मिलने पर दौड़ा-दौड़ा पुस्तक की दुकान पर गया और उसने प्रेमचन्द का गोदान खरीदा था।



अपनी उपलब्धियों पर मौन रहने वाले सुरेश ने बताया कि पुलिस विभाग और उसमें काम करने वाले छोटे-बड़े अधिकारी समाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। शोषित-पीड़ित को न्याय दिलाने में उनकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। दुःख तो इस बात का है कि पुलिस वाले अपने आपको पहचानने में भूलकर बैठे हैं बिलकुल वैसे जैसे जनता द्वारा चुने गये नेता।

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Wednesday, July 28, 2010

गीतकार शैलेन्द्र से जुड़ी हैं मथुरा की यादें


मथुरा, ‘‘होठों पर सच्चाई रहती है, दिल में सफाई रहती है, ‘‘ मेरा जूता है जापानी,’’ ‘‘आज फिर जीने की तमन्ना है’’ जैसे दर्जनों यादगार फिल्मी गीतों के जनक शैलेंद्र का बचपन मथुरा की गलियों में बीता। तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड से नवाजे गए और अभिनेता राजकपूर की आंखों के तारे रहे शैलेन्द की मथुरा से जुड़ी अनेक यादों का स्मरण कर 90 साल के बाबूलाल की आंखे नम हो जाती है। बाबू लाल शैलेन्द्र के एक मात्र जीवित सहपाठी हैं जो मथुरा के किशोरी रमण इंटर कॉलेज में उनके साथ पढ़े और धौली प्याऊ कालोनी में पड़ोसी रहे। बाबूलाल रेलवे में फोरमैन की नौकरी से रिटायर हुए।



किसी जमाने में मथुरा रेलवे कर्मचारियों की कालोनी रही धौली प्याऊ की गली गंगासिंह के उस छोटे से मकान की पहचान सिर्फ बाबू लाल को है जिसमें शैलेन्द्र अपने भाईयों के साथ रहते थे। सभी भाई रेलवे में थे। बड़े भाई बीडी राव शैलेन्द्र को पढ़ा-लिखा रहे थे। बाबू लाल ने बताया कि मथुरा के राजकीय इंटर कॉलेज में हाईस्कूल में शैलेन्द्र ने पूरे उ0प्र0 में तीसरा स्थान प्राप्त किया। वह बात 1939 की है। तब वे 16 साल के थे। केआर इंटर कॉलेज में आयोजित अंताक्षरी प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे और खूब ईनाम जीतते थे। इसके बाद शैलेन्द्र ने रेलवे वर्कशाप में नौकरी कर ली। बाबूलाल भी रेलवे में लग गए। कुछ दिन मथुरा रहकर शैलेन्द्र का तबादला मांटुंगा हो गया बाबूलाल मथुरा मे ही रहे।



बाबू लाल ने बताया कि शैलेन्द्र से वे भी मिलने मुंबई जाते रहते थे। वे भी मथुरा आते रहते थे। मथुरा आते ही वे गुनगुनाते थे- ‘‘जहां पर मेरी मथुरा नगरी, वहां पर जमुना जल, तू चला चल’’। अपनी गली गंगासिंह के नुक्कड़ पर बैठकर वे कहते थे- मरने के बाद चरचा होगी तेरी गली में, मरना तेरी गली में, जीना तेरी गली में। बाबूलाल ने बताया कि कुछ साल बाद खबर आई कि शैलेन्द्र ने नौकरी छोड़ दी है। हम मुंबई गए तो उन्होंने पूरा किस्सा सुनाया कि उन्होंने दस गीत लिखे थे। पैसे की जरूरत थी। राजकपूर से एक बार पहले भी मिल चुके थे। दस गीतों के साथ उन्होंने उनसे मिलने का वक्त मांगा। उन दिनों राजकपूर बरसात फिल्म की तैयारी में जुटे थे। तय वक्त पर शैलेन्द्र राजकपूर से मिलने घर से निकले तो घनघोर वारिश होने लगी। कदम बढ़ाते और भीगते शैलेन्द्र के होंठों पर ‘बरसात में तुम से मिले हम सनम’ गीत ने अनायास ही जन्म ले लिया। अपने दस गीत सौंपने से पहले शैलेन्द्र ने इस नए गीत को राजकपूर को सुनाया। राजकपूर ने शैलेन्द्र को सीने से लगा लिया। दसों गीतों का पचास हजार रूपये पारिश्रमिक उन्होंने शैलेन्द्र को दिया। नया गीत बरसात का टाइटिल गीत बना। बाबूलाल ने बताया कि शैलेन्द्र ने नौकरी छोड़ दी और विरार में ‘रिमझिम’ नाम से कोठी बना ली।

एक सवाल के जबाब में बाबूलाल बोले कि उस जमाने में उन्हें याद नहीं कि शैलेन्द्र प्रसिद्ध थे या नहीं, पर मुंबई जाने पर उनकी संपन्नता दिखाई देती थी। उन्होंने कहा मैंने रिमझिम में शंकर जयकिशन को बैठे कई बार देखा। दो गाड़ी थी शैलेन्द्र के पास। एक गाड़ी वे मेरी सेवा में लगा देते थे। एक दिन मालूम पड़ा कि शैलेन्द्र राजकुमार के साथ गाड़ी में बैठकर गए हैं। यह बात उनकी गजभर का घूंघट निकालने वाली पत्नी ने बताई। शैलेन्द्र का विवाह बीना स्टेशन मास्टर की बिटिया से हुआ था। मैं इंतजार में बैठा था। शैलेंद्र ने लौटकर बताया कि राजकपूर को कल एक गीत लिखकर देना है। मैं सो गया और वे पीते रहे। सुबह चार बजे वे उठे और जुहू बीच की ओर निकल गए। वापस आए तो होंठो पर मुस्कराहट थी और हाथ में पकड़े कागज पर गीत लिखा था। बाद में शैलेन्द्र ने बताया कि समुद्र की मचलती लहरें उनके गीतों को प्रेरणा देती हैं।



शैलेंद्र ने बाबूलाल को एक बार बताया कि राजकपूर ने तीसरी कसम फिल्म बनाने से उन्हें मना किया था। दरअसल, शैलेन्द्र को फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम बहुत पसंद आई। उन्होंने गीतकार के साथ प्रोड्यूसर बनने की ठानी। राजकपूर और वहीदा रहमान को लेकर तीसरी कसम बना डाली। खुद की सारी दौलत और मित्रों से उधार की भारी रकम फिल्म पर झोंक दी। फिल्म डूब गई। कर्ज से लद गए शैलेन्द्र बीमार हो गए। यह 1966 की बात है। अस्पताल में भरती हुए। तब वे ‘‘जाने कहां गए वो दिन, कहते थे तेरी याद में, नजरों को हम बिछायेंगे’’ गीत की रचना में लगे थे। शैलेन्द्र ने राजकपूर से मिलने की इच्छा जाहिर की। वे बीमारी में भी आरके स्टूडियों की ओर चले। रास्तें में उन्होंने दम तोड़ दिया। यह दिन 14 दिसंबर 1966 का था। मौके की बात है इसी दिन राजकपूर का जन्म हुआ था। शैलेन्द्र को नहीं मालूम था कि मौत के बाद उनकी फिल्म हिट होगी और उसे पुरस्कार मिलेगा।

बाबूलाल ने बताया कि उन्हें न तो गीत तकनीक की समझ है और न साहित्य से लगाव, पर अपने मित्र शैलेन्द्र के गीतों के मुखड़े उन्हें कंठस्थ है। सोते-जागते वे इन्हें गुनगुनाया करते हैं। शैलेन्द्र तीसरी कसम की नाकामयाबी के बाद के बाद मथुरा आए तो बोले यार एक फिल्म बनाने की इच्छा है जिसमें केआर इंटर कॉलेज और अपनी गंगा सिंह गली के दृश्य फिल्माना चाहूंगा। शैलेन्द्र की यह इच्छा पूरी नहीं हुई।शैलेंद्र के बेटे शैली श्ैालेंद्र मुम्बई में फिल्मी गीतकार हैं1

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Saturday, June 26, 2010

वृन्दावन में मौजूद है एक ग्रन्थ समाधि


अशोक बंसल



कृष्ण की क्रीड़ा स्थली वृन्दावन में साधु-सन्तों की समाधियों के मध्य एक ऐसी अनूठी समाधि भी हैं जिसमें किसी इंसानी काया के अवशेष न होकर सैंकड़ों वर्ष पुराने हस्तलिखित ग्रन्थों का भंडार हैं ! यह समाधि विश्व में अपने तरीके की अकेली समािध है और वृन्दावन के विद्वान समय समय पर इस ग्रन्थ समाधि के उत्खनन की माँग करते रहे हैं ताकि समाधि में दफन दुर्लभ ग्रन्थों को जाना जा सके।

वृन्दावन मे कालीदह घाट पर स्थित विशाल टीले पर 511 फीट ऊँचे लाल पत्थर के आकर्षक मदन मोहन मन्दिर, जिसके आँगन में दुर्लभ ग्रन्थ समाधि है, के निर्माण की कथा बहुत रोचक है। मथुरा गजेटियर के मुताबिक कालीदह घाट के पास स्थित टीले पर वैष्णव सम्प्रदाय के प्रबल उपासक सनातन गोस्वामी का डेरा था। बात साढे़ चार सोै वर्ष पुरानी है । एक दिन यमुना नदी में काली मर्दन घाट पर सामान से भरी नाव फंस गई। सामान मुल्तान के खत्री व्यापारी रामदास का था और वह आगरा की ओर कूच कर रहा था। परेशान रामदास टीले पर बैठे सन्त सनातन के पास गया और नाव फंसने की बात कही। सनातन ने अपने मदनमोहन मन्दिर में शीष नवाने का सुझाव दिया। व्यापारी रामदास ने ऐसा ही किया और उसकी पानी में फंसी नाव चल पड़ी । आगरा से लौटकर रामदास ने सनातन गोस्वामी के मदन मोहन मन्दिर केा लाखों रूपया खर्चकर विशाल और आकर्षक बना दिया। विक्रम सं0 1726 में औरगजेब की फौजों ने वृन्दावन में धाबा बोला और अनेक मन्दिरों का जमकर घंस किया। मदन मोहन मन्दिर पर भी आक्रमण हुआ । मन्दिर के पार्श्व में समाधि बाड़ी है। इस मन्दिर में सेवायत गोस्वामियों की अनेक समाधियाँ है। सनातन गोस्वामी और उनके भाई रूप गोस्वामी संस्कृत भाषा के प्रकांड पडित थे और उन्होनें अनेक ग्रन्थों की रचना की थी। विद्वानों का मत है कि औरंगजेव के आक्रमण की खबर सुन सनातन और रूप गोस्वामी के भक्तों ने अनेक ग्रन्थों को बक्सो में बन्द कर गोस्वामियों की समाधियों के मध्य एक खाली जमीन में दफना दिया । बाद में इस स्थान पर संगमरमर की समाधि का रूप दे दिया गया जो आज भी सुरक्षित हैं। इस समाधि पर ‘गन्थ-समाधि’ लिखा है।

ब्रज संस्कृति के प्रसिद्व विद्वान एवं ‘वृन्दावन शोध संस्थान’ के पूर्व निदेशक डा0 नरेश चन्द्र बंसल ने बताया कि गन्थ समाधि में सनातन, रूप और जीव गोस्वामी जैसे ग्रन्थकारों के हस्तलिखित गन्थ होने की पूरी सम्भावनाऐं है। मन्दिर के सेवायत अपने पूर्वजों की इस निधि को जस का तस जमीन में दफन रखना चाहते हैं। लेकिन इस राष्ट्रीय घरोहर को बाहर निकाला जाना बेहद आवश्यक है। इससे वृन्दावन का गौरव बढे़गा और सनातन धर्म के इतिहास पर नई रोशनी पड़ेगी । नरेश बंसल का कहना है कि पुराने जमाने में ग्रन्थों को सुरक्षित रखने की तकनीक बेहद कारगार थी। गन्थ समाधि के उत्खनन से इस तकनीक का भी पता चलेगा।





कलम के नीचे अण्डा


अशोक बंसल

प्रो0 सुखराम विष्वविद्यालय द्वारा कराए जा रहे उत्तर पुस्तिाकाओं के मूल्यांकन में जुटे है। कापियाँ जाँचने में शरीर पसीना छोड़ रहा है। पर प्रोफेसर साहब कापियों के पन्नें धकापेल पलट रहे हैं। कापी के पन्ने चिपके पड़े हैं सो सुखराम अंगुलियों को कभी पसीने से सने माथे पर लगा चिकनाई देते हैं तो कभी जीभ के अग्रभाग पर मौजूद लार में भिगोकर । ऐसा करने से पन्ने पलटने में सुविधा रहती है। 5 घन्टों में 300 कापियाँ जाँचनी है। एक दिन में 3 हजार रू0 की दिहाड़ी बैठ रही है।

प्रो0 सुखराम मेराथन गति से कापियोँ का मूल्यांकन कर रहे हैं। इतिहास के प्रोफेसर हैं पर उनकी करामती कलम किसी भी विषय की कापी पर नम्बर टपकाने में सक्षम है ! उनके इतिहास के बंडल में भूलवष कुछ हिन्दी की कापियाँ निकलने लगी। प्रो0 सुखराम को सुध ही न रही । इतिहास के साथ हिन्दी भी जाँच दी। काफी देरी बाद भूल सुधार किया। आसपास की कुर्सियों पर बैठे अन्य प्रोफेसरों को पास वाले की गलतियों पर हँसने -रोने की फुरसत नहीं सो सुखराम अपनी करामात पर खुद ही हँसे । थोड़ी देर तक पन्नों पर नम्बर टपकाने की गति धीमी पड़ी लेकिन क्षणभर बाद कलम ने गति फिर पकड़ ली।

प्रो0 सुखराम के काम करने की गति कुलपति को भा रही है। एक जमाना था जब विष्वविद्यालय षिक्षा के स्तर को सुधारने के लफड़े में माथापच्ची करते थे। स्तर तो गया भाड़ में, विष्वविद्यालय के आर्थिक संसाधन गड़बड़ा गए। स्ववित्त पोषित योजना आई। विष्वविद्यालय मालमाल हो गए। उच्च षिक्षा की दुकानें गाँव-गाँव खुल गई। परीक्षा तो हो गई पर कापियाँ कैसे जँचे। लाखों कापी और षिक्षक गिनती के । ऐसे में सुखराम जैसे परीक्षक कुलपति के आँख के तारे हैं। इन्ही की बदौलत रिजल्ट समय पर निकालेगा और फिर सत्र नियमित होने पर राज्यपाल की शाबाषी मिलेगी कुलपति को।

पुराने वक्त के ज्ञान पिपासु कंधे पर झोला लटकाए देषाटन पर निकल जाते थे। प्रो0 सुखराम का जेठ और आषढ़ आधुनिक देषाटन में बीतता है। झोला की जगह छोटी अटेैची है। इसमें अंगोछा तो पुराने जमाने वाला है लेकिन सफारी सूट आधुनिक है। एक दर्जन लाल पैन हैं। प्रो0 सुखराम मेरठ, झाँसी, बरेली के विष्वविद्यालय में हो रहे मूल्यांकन में कापियों में कबड्डी खेल आए। अब आगरा की बारी है। इसके बाद कानपुर जाना है।

शैक्सपीयर ने कहा है ‘म्यूजिक प्यार का भोजन है, बजाए जाओ। पुराने नए गाने सुनने के लिए अब ट्रांजिस्टर की कोई आवष्यकता नहीं !मोबाइल में मधुर धुनें भरी पड़ी हैं। 56 बसन्त देख चुके एक षिक्षक ने मूल्यांकन टेबिल पर मोबाइल घर दिया है। माचिस जैसे मोबाइल में से आ रही ‘ मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई’ की ध्वनि पर बूढ़ी उँगलियाँ उत्तर पुस्तिकाओं पर मचल रही हैं पर पास बैठे कुछ नौजवान परीक्षक नाक भौं सिकोड़ कर फड़कता हुआ गाना सुनने की फरमाइष कर रहे है। अचानक हॉल में ‘वाह’ की जोरदार आवाज से परीक्षकों की लाल कलमें थम गई। यह विस्फोट सुखराम के मुहँ से हुआ था। बेचारे सुखराम अपनी आवाज पर खुद भी चौंक गए। परीक्षक साथियों ने सवाल उछाला, ‘‘क्या हुआ बंधु ?’’ सुखराम हक्के बक्के और मौन। पडौसी परीक्षकों को सुखराम की कापी से 500 सोै का एक नोट आलपिन से जुड़ा दिखाई दिया। दूर बैठे परीक्षकों ने अपना सवाल ‘क्या हुआ’ दोहराया। सुखाराम ने जबाब दिया, ‘‘मुर्गी ने अण्डा दिया है।’’

हॉल में ‘समोसे मँगाओ’ की अवाज गूँजे इससे पूर्व प्रो0 सुखराम ने नोट पर अपनी लाल कलम गड़ा दी मानो मुर्गी अपने अण्डे को सेह रही हो।

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Thursday, May 27, 2010

रामदेव जी! सिर्फ पैसे से नहीं आयेगी खुशहाली


अशोक बंसल

स्वकस्थ’ रहने के लिए योग जरूरी का सार्थक प्रचार कर अपने नाम की शोहरत बटोर चुके बाबा रामदेव अब देश की जर्जर काया का कल्प करने का ब्रत ले बैठे हैं । बाबा ने मान लिया है कि सफेदपोश नेताओं के आगे उपदेश की ढपली बजाकर देश में खुशहाली लाना बेमानी है। भारत स्वाेभिमान जवान संस्था का गठन कर बाबा देश प्रेम का अलख जगाने में जुट गये हैं। उहोंने देश वासियों के बीच स्विस बैंकों में जमा काले धन को स्वदेश लाने के सवाल को मुद़दा बनाया है ।बाबा की जुबान पर देश के काले धन के चौकाने वाले आंकडे हैं। मसलन स्विस बैंक में हमारे देश के नेता, व्याापारियों और अधि‍कारियों के तीन सौ लाख करोड की रकम काले धन के रूप में जमा है। इस धन को वापस लोने में मौजूदा सरकार कोई पहल नहीं कर रही है। अत्‍- अगले चुनाव में भारत स्वानभिमान जवान के लोग संसद में पहुंच कर सत्ताे की बागडोर सभालेंगे और स्विस बैंक में जमा काले धन को वापस लाकर देश को खुशहाल बनायेगे ।

राजनैतिक व आर्थिक चिंतन से शून्य बाबा की रणनीति संसद में अपने समर्थ्‍कों को भेजवाने में कामयाब हो पायेगी, यदि हां तो उनके समर्थक स्विस बैंक में जमा पैसे को देश में वापस ला पायंगे कि नहीं। यदि हां तो इस पैसे से देश की गरीबी कैसे दूर होगी, मजदूर किसान और वेरोजगार कैसे खुशहाल होंगे आदि प्रश्नों के उत्तदर बाबा के पास नहीं है । आजादी के बाद सत्ता् संभालने वाले नेता मजदूर किसानों को सब्ज बाग दिखाकर सत्ता पर बार बार काबिज होने के गुर सीख गये हैं । सत्तातधरियों की गरीबी तो दूर हो गयी है लेकिन देश में भूख से मरने वालों की उपस्थिति आज भ्‍ी बनी हुई है । ऐसा नहीं कि हमारे प्रजातांत्रिक देश के संविधान में सबकुछ गडबड है । संविधान में बर्णित सारे कायदे कानून  दुरूस्त है लेकिन सस्ताा पर काबिज नेता और इसकी चाहत में इर्दगिर्द घूमने वाले सफेद पोशों की फौज संविधान की रक्षा में नहीं बल्कि इसे ध्वेस्त करने में लगी है ।

ऐसे में बाबा और उनके अनुयायियों को समझना होगा कि हमारे देश में खुशहाली लाने का इलाज महज सत्ताा परिवर्तन नहीं बल्कि सत्ता पर काबिज लोगों के खिलाफ व्यापक जन आन्दोलन की शुरूआत करना है । बाबा रामदेव ने योग को प्रचारित करने में पांच वर्ष से जयादा का वक्त लगाया तब उन्‍हें हमारे मानस पर योग की सता काबिज करने में कामयाबी मिली1 सिर्फ राजनैतक ताकत हासिल कर देश की गरीबी और भ्‍ुखमरी दूर करने का बाबा का सपना कैसे सच सावित होगा । इस प्रश्न का उत्तर बाबा रामदेव के समर्थकों को देना होगा। क्या ही अच्‍छा हो यदि बाबा देश में मौजूदा भ्रष्टाकचार, अशिक्षा, अन्‍धविश्वाास आदि कुरीतियों के विरूद्व व्याापक और दीर्घ आन्दोलन की रूपरेखा बनायें। सम्भ व हे बाबा का यह आन्‍दोलन करोडों दिशाहीन युवकाें को सही रास्ता दिखाने का काम करे । मथुरा के बाबा जयगुरूदेव ने भी बाबा रामदेव की तर्ज पर दूरदर्शी पार्टी का गठन कर राजनीति में दस्ताक दी थी । सतयुग आयेगा और कलयुग जायेगा के लोकप्रिय नारे ने बाबा जयगुरूदेव के भक्तों की संख्या में जबरदस्त इजाफा किया था। बाबा की दूरदर्शी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की सभ्‍ी सीटो पर चुनाव लडा लेकिन जबरदस्त निराशा हाथ लगी 1 तब बाबा ने राजनीति एक वैश्या है कहकर दूरदर्शी पार्टी को भंग कर दिया। अब उन्हों ने अपने प्रवचनों को आध्यात्म और समाज सेवा तक ही सीमित कर रखा है। बाबा जयगुरूदेव के आश्रम पर साल में लगने वाले कई विशाल भण्उारो में लाखों की भीड; आज जुटती हैा इन भण्डागरों में दहेज रहित विवाह को बाबा बढावा देते हैं ।बाबा विवादों से दूर हैं।

अंत में, बाबा रामदेव के सत्ता् में आने के सपने सच हो या न हो पर इतना निश्चि त है कि बाबा के राजनीति में आने के प्रयास का लाभ कोई एक राजनैतिक पार्टी  उठायेगी। बाबा रामदेव के हाथ वैसी ही निराशा हाथ लगेगी जैसे कि बाबा जयगुरूदेव को किसी वक्त लगी थी ।



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Monday, May 24, 2010

स्वर्ग की सीढ़ियों पर नरक की


परछाइयां



धार्मिक भावनाओं की तुष्टि के सिलसिले में वृंदावन का नाम कुछ ज्यादा ही श्रद्धा से लिया जाता है । बंगाल में तो बहुत पहले से मान्यता रही है कि स्वर्ग के दरवाजे पर दस्तक वृंदावन में रहकर ही दी जा सकती है । वैधव्य की आपदाओं से घिरी बंगाली स्त्रियों को बाकी जीवन के लिए वृंदावन एक जैसे ताकत देता रहा है । यही कारण है कि वृंदावन में बंगाली विधवाओं की उपस्थिति एक शताब्दी से लगातार बनी हुई है । ये विधवाऐं यहॉं स्वर्ग की आस लिए आती हैं और इसी आस के सहारे सारा जीवन नारकीय यातनाओं को भोगते गुजार देती हैं । इन अनपढ़, सीधी-सच्ची और दुखी औरतौं को इस बात का तनिक आभास नहीं होता कि उनकी वर्तमान हालत पुराने जन्मों के पापों का फल न होकर सुनयोजित ढंग से धर्म के नाम पर खड़े किए गए आडबंर के कारण है । वृंदावन में बंगाली विधवाओं की स्थिति एक बार जाल में फंसने के बाद कभी न निकलने वाली मछली की मानिद है ।

घटती-बढ़ती तकरीबन तीन हजार की गिनती में हमेशा बने रहने वाली विधवाओं के दुख-दर्द की कहानी वृंदावन के एक आश्रम से प्रत्यक्ष रुप से जुड़ी है । वृंदावन के पत्थरपुरा इलाके में इस आश्रम की स्थापना 1914 में जानकीदास पटोरिया नाम के सेठ ने की थी । ‘भगवान भजनाश्रम’ नाम के इस आश्रम की स्थापना बंगाली बाइयों को अनैतिक काम में पड़ने से रोकने और जीवन यापन की व्यवस्था करने जैसे पवित्र उद्देश्य को लेकर की गई थी । विधवाओं के नाम पर आने वाली दान की रकम कीे नाम मात्र की पूंजी से खड़े किए भजनाश्रम का अरबों का बना दिया है । वृंदावन के अलावा मथुरा, गोवर्धन, बरसाना, राधाकुंड, गोकुल आदि स्थानों पर भजनाश्रम की शाखाऐं जड़ जमा चुकी हैं ा चित्रकूट के पास नवद्वीप और बंबई में भी आश्रम की अथाह संपति है । दूसरी ओर भजन करने वाली बाइयों की हालत इतनी दयनीय है कि पत्थर भी पिघल जाए ।

आठ घंटे मजीरे पीट-पीट कर मुक्त कंठ से ‘हरे राम राम राम हरे हरे’ का उद्घोषण करने के बाद एक बाई को ढाई सौ ग्राम चावल और एक रुपए की आश्रम मुद्रा की मुद्रा मिलती है ।

इंसान का वर्तमान जितना कष्टप्रद और असुरक्षित हो, भविष्य की असुरक्षा का भय उसे उतना ही सताता है । सतरह साल की जवान बाई से लेकर अस्सी साल की लाठी के बल पर चलने वाली या सड़क पर घिसटने वाली विकलांग बाई तक सभी ढ़ाई सौ ग्राम चावल पेट में झोंक कर जिंदा रहतीं हैं और एक रुपया बचा लेती हैं । सेवा कुंज, मदन मोहन का घेरा और गोविंद जी के घेरे में बनी कभी भी गिरने वाली अंधेरी, सीलन भरी और बदबूदार कोठरियों में सात-सात, आठ-आठ की संख्या में ठुसी बाइयां अपनी अमूल्य निधि ‘एक रुपए’ को रखने का सुरक्षित स्थान नहीं ढूंढ़ पाती । वे आश्रम के बाबूओं के पास ब्याज के लालच में इस रकम को जमा कराती रहती हैं । बाइयों के आगे-पीछे कोई होता नहीं, सो बाई के मरने बाद उसका धन भी छूट जाता है । अनेक बाइयां वृंदावन पलायन करते समय साथ में लाई हुई पूंजी भी ब्याज पर उठा देती हैं । शाम के वक्त वृंदावन में मंदिरों के आगे इन्हीं बाइयों को भिक्षावृति करते देखा जा सकता है । इस भिक्षावृति के पीछे संचय की प्रवृति भी है ।

बाईयॉं सुबह 10 बजे जब भजनाश्रम से अपनी कोठरियों की ओर कूच करती है तो रास्ते में पड़े झूठे पत्ते उन्हें आगे बढ़ने नहीं देते । अस्थिपंजर बने रुग्ण शरीर उन्हें चाटने लगते हैं । बाइयों को आश्रम के कर्मचारी भी प्रताड़ित करने से पीछे नहीं रहते । एक बार एक बुढ़िया बाई को आश्रम की सीढ़ियों से केवल इसलिए धकिया दिया गया कि वह भजन के लिए कुछ देर से आई थी । रक्तरंजित बाई मिन्नतों और गिड़गिड़ाने के बाद भी आश्रम में प्रवेश न पा सकी। उस दिन उसे बिना चावल के ही गुजारा करना पड़ा । अमानवीयता और अत्याचार की मिलीजुली संस्कृति ने आश्रम के प्रति बंधुआ मजदूरों का सा भय और आंतक इन निरपराध बाइयों के मन में भर दिया है । आश्रम के कर्मचारियों के घरों का काम, सफाई, झूठे बर्तन साफ करना आदि भी इन्हीं बाइयों से लिया जाता है । इसके लिए उसे अतिरिक्त पैसा नहीं मिलता । ‘भजनाश्रम’ के पास अपना एक आयुर्वेद संस्थान भी है जिसमें करीब चालीस दवाएं बनती हैं । दवाओं के कूटने, शीशियों में भरने और पैकिंग करने आदि का काम इन्हीं बाइयों से लिया जाता है ।

समूचे देश के दानदाता भजनाश्रम की बाइयों के लिए हजारों रुपए के हिसाब से भेज रहे हैं । इसके अलावा सावन और फागुन के महीने में मारवाड़ी लोग वृंदावन आते हैं तो हजारों की रकम आश्रम को दान कर जाते हैं ा कंबल, रजाई आदि बांटने के लिए दे जाते हैं । बीस साल से वृंदावन में रह रही दो बाइयों ने बताया कि उन्हें आज तक कोई रजाई या कंबल नहीं दिया गया । वृंदावन में स्थित फोगला आश्रम भी भजनाश्रम की एक शाखा है । साल में चार महीने इस आश्रम में रोजाना चलने वाली रासलीला में हजारों श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं । आयोजक घड़े लेकर रासलीला के खत्म होने पर चढ़ावे के लिए जनता के बीच निकलते हैं । कहते हैं करीब तीस-चालीस हजार की रकम रोजाना इकट्ठी हो जाती है । फोगला आश्रम के अतिरिक्त भजनाश्रम की दो बड़ी-बड़ी इमारतें और भी हैं-- खेतावत भवन और वैश्य भवन । इन भवनों में बने आलीशान कमरे दानदाता सेठों के आने पर ही खुलते हैं लेकिन प्रचारित यह किया जाता है कि यह भवन बाइयों के लिए बनाए गए हैं ।

एक धर्मिक नगर में लोग बाइयों के हक में आवाज उठाने को तैयार नहीं है । महानगरों में नारी-शोषण के खिलाफ प्रदर्शन होना एक आम बात है । लेकिन वृंदावन की बाइयों के हक की आवाज उठाने की सुध् किसी को नहीं । वृंदावन की बाइयों की व्यथा पर कथा लिखने वालों की कमी नहीं रही। समय-समय पर देशी-विदेशी कैमरे इन बाइयों के चित्र उतारते रहते हैं । सामाजिक संगठन इनकी दुर्दशापर कभी-कभी चर्चा भी करते देखे गए हैं लेकिन स्वर्ग की आस में नरक जैसा जीवन जीने वाली बेसहारा औरतों को सहारा देने वाला कोई नहीं ।