Sunday, February 26, 2012


            कमबख्त फिसल गई  
            अशोक  बंसल

नेताओं की जुबान न फिसले यह कैसे हो सकता है l इस चुनाव में तो यह खूब फिसली कांग्रेस  के जयप्रकाश जायसवाल ,बेनी प्रसाद,सलमान खुर्शीद सरीखे नेताओं ने अपनी जुबान दांतों के पीछे रखने की भरपूर कोशीश की .कमबख्त न मानी l
    बात पुरानी है लेकिन मुझे याद है। भारतीय जनता पार्टी के नेता लाल कृष्ण  आडवाणी पाकिस्तान गए थे। वहॉं उन्हे लियाकत अली जिन्ना की मजार पर फूल चढ़ाने का मौका मिला। टी.वी. चैनलों का माइक देख नेता बेकाबू हो जाता है। शरीर में सिरहन दौड़ जाती है और जुबान हरकत में आ जाती है। आडवाणी के साथ भी यही हुआ। बेचारे बोल गए ‘जिन्ना सेक्यूलर थे।’
     फिर क्या था। पूरे देश  में बबाल मच गया। अखबार और टी.वी. वालों को मसाला मिल गया। आडवाणी के मार्ग दशकों को यदि किसी शब्द से नफरत है तो वह है ‘सेक्यूलर’। उनके अपने दुलारे आडवाणी अपने मुखारबिन्द से सेक्यूलर का उच्चारण करें इसे कैसे बर्दास्त किया जाए। संघ के कार्यकर्ताओं ने आडवाणी को बुरा भला कहा। फंस गए बेचारे आडवाणी।
   लोगों की समझ से परे है कि आखिर आडवाणी पाकिस्तान गए ही क्यों! और यदि गए तो वहां बोले ही क्यों? न बोलते और न फजीहत होती। ‘ऊंच-नीच’ होने पर ‘पब्लिक-प्रेसर’ में ‘सॉरी’ बोलो तो सारी इमेज चौपट हो जाती है। आडवाणी ने चिंतन किया पर समझ न सके अपनी गलती को । आडवाणी बड़बड़ाये  - ‘मेरे देश  के लोंगों की समझ में नहीं आता तो मैं क्या करूं। क्या जमाना आया है अपने ही अपनों के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं।’
     आडवाणी नहीं जानते कि तोल मोल कर कैसे बोला जाता है। अटल जी इस वक्त रोग शय्या पर हैं l चलते फिरते थे तब  वह टोल मोल कर बोलने में  दक्ष  थेl  ऐसे संकट के क्षणों में ही आडवाणी को अटल याद आते हैं। गले पड़ी आफत कैसे छूटे। मुंह   से निकली बात और बन्दूक से छूटी गोली वापस नहीं आती। पता नहीं आडवाणी के दिमाग में क्या-क्या आ रहा  था । कोई नहीं जानता। उन्होंने सोचा कि अटल जी के पास चलो, वह कल्याण करेंगे।
     अटल मन्द-मन्द मुस्कराए और फिर बोले, ‘आडवाणी जी हमारी आपकी एक ही उम्र है। हमें धैर्य से काम लेना होगा। इन नौजवानों को बूढ़े-बढ़ों की पहचान नहीं है। जो हो गया सो हो गया। एक चुप सौ को हराती है। मौन धारण कर लो। आगे फजीहत न हो इसकी प्लानिंग करो।’ ‘कैसी प्लानिंग ?’ आडवाणी ने पूछा।
    ’तराजू में तोल कर बोलो। कुछ न सूझे तो मेरी तरह ऑंखें बन्द कर चुप्पी साध लो।’ अटल जी ने वास्तव में ऑंखें मूंद ली।
     जिस आडवाणी ने अटल की किसी बात को कभी गंभीरता से नहीं लिया वह भी इस सलाह पर न्योछावर हो गए l आडवाणी ने अटल स्टाइल में ऑंखें मीचीं और हाथ जोड़कर जीभ निकालकर बोले, ‘अटल जी क्या करूं कमबख्त फिसल गई चमडे की जो है।’ अटल मुस्कराए ‘आप ठीक कहते हैं  l  आगे से  इसे दॉंतों के भीतर रखो।’
अपुष्ट सूत्रों की खबर है कि सोनिया ने अपने बडबोले नेताओं को  भी अटलजी की सलाह भेजी है l
--------------------------------------------------अशोक बंसल ,१७ बलदेव पुरी एक्सटेंशन ,मथुरा
                                                    ९८३७३१९९६९

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Sunday, January 22, 2012


   



 स्वाधीनता संग्राम का असली चरित्र

रतन  लाल बंसल

आज हम अपनी आजादी की वर्षगाँठ मनाने के लिए यहां एकत्रित हुए हैं आज से लगभग 30 वर्ष पूर्व हमारे देश  को इन दिनों ही ब्रिटिश  दासता से मुक्ति प्राप्त हुई थी। यह आजादी हमको अनुदान के रूप में नहीं मिली थी, बल्कि यह उस सतत संघर्ष का परिणाम था, जिसके लिये हमारे देश  के लाखों नर नारियों ने वीरता पूर्वक संघर्ष किया था और सभी प्रकार का त्याग किया था। इस त्याग और बलिदान के पावन इतिहास का एक अध्याय मैं यहां आपके समक्ष प्रस्तुत करने के लिए खड़ा हुआ हूं। यह अध्याय सन् 1857 से लेकर सन् 1900 ई. तक हमारे देश  के जनजागरण और स्वतंत्रता की भावना के उद्दीपन की गाथा है।
भारत में अंग्रेजों की सत्ता के विरूद्ध सबसे बड़ा और सबसे व्यापक विद्रोह सन् 1857 में हुआ जिसे जनसाधारण गदर के नाम से जानता और पुकारता है।
1857 में हुए इस राज्य विप्लव  के विषय में  इतिहासकारों के मध्य आज भी यह विवाद प्रचलित है कि उस भीषण विद्रोह को स्वतंत्रता संग्राम माना जाना चाहिए या नहीं। इस विषय में मेरी विनम्र धारणा यह है कि इस विद्रोह में सभी प्रकार के तत्व सम्मिलित थे।  1857 के विद्रोह के नेताओं में ऐसे लोग भी थे, जो अंग्रेजों द्वारा किये गये कुछ प्रगतिषील सुधारों, जैसे सती प्रथा का उन्मूलन आदि कार्यो से नाराज थे। कुछ ऐसे सामन्त थे जिनके राज अंग्रेजों ने हड़प लिये थे। कुछ ऐसे अराजक तत्व भी थे जो केवल लूटमार का अवसर प्राप्त करने के लिए विद्रोही बन गये थे। लेकिन ऐसे दूरदर्षी और सच्चे देषभक्त भी थे जो भारत पर अंग्रेजों के शासन को राष्ट्रीय सम्मान के विरूद्ध समझते थे। ऐसे लोगों में मुसलमान मौलवियों और विद्वानों का एक दल भी था, जिसने सन् 1803 में ही, जब अंग्रेजों ने दिल्ली पर अधिकार स्थापित किया, अंग्रेजों के विरूद्ध खुलेआम आवाज बुलन्द की थी और मुसलिम जन साधारण को अंग्रेजों के विरूद्ध सशस्त्र युद्ध करने के लिए संगठित करने का प्रयास किया था।
सन् 1857 के विद्रोह के विषय में अभी तक जो सामग्री एकत्रित की जा सकी है उसके अध्ययन से यह बात भी प्रकाश  में आती है कि विद्रोह में भाग लेने वाले कुछ लोग विद्रोह के सफल हो जाने पर भारत में ऐसी राज्य सत्ता स्थापित करने का स्वप्न देख रहे थे जो किसी सीमा तक लोकतंत्र पर आधारित होती l  दिल्ली में विद्रोहियों की जो बार कौंसिल बनाई गई थी उसमें प्रत्येक सैन्य दल से निर्वाचित प्रतिनिधि सदस्य बनाये गये थे। उस पिछड़े हुए जमाने में यह पद्धति कोई साधारण बात नहीं थी।
इसी प्रकार जब लखनऊ जाती हुई अंग्रेजों की एक सेना की छावनी से जब एक भारतीय विद्रोही को गिरफ्तार किया गया, जिसका नाम मुहम्मद अली था और जो उन भारतीयों में से एक था जिन्होंने सबसे पहले रूड़की के कॉलेज में इंजीनियरिंग की  शिक्ष  प्राप्त की थी और जो दो बार इंगलैण्ड हो आया था, तो उसने फाँसी के तख्ते पर चढ़ने से पहले अंग्रेजों की सेना के एक अधिकारी फार्बस मिचैल से कहा था कि यद्यपि हम भारत से अंग्रेजों की सत्ता हटाने में असफल हुए हैं, फिर भी मुझे सन्तोष है कि भारत से ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज समाप्त ने जा रहा है और अब ब्रिटिश  पार्लियामेंट का प्रत्यक्ष शासन भारत पर होगा। इस तरह हम कुछ न कुछ करने में तो सफल हुए ही हैं।
फाँसी के फन्दे को सर से ऊपर झूलते हुए देख कर भी ईस्टइंडिया कम्पनी के शासन की अपेक्षा लोकतंत्रीय पद्धति से चुनी गई पार्लियामेंट के शासन को श्रेष्ठ बताने के हृदय में लोकतंत्र के लिए कितनी निश्ठा रही होगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इसी लिये मेरा निवेदन है कि सन् 1857 के महान् विद्रोह में सभी प्रकार के विचारों के लोग सम्मिलित थे l  यह विद्रोह विदेशी  सत्ता को अपदस्थ करके स्वदेषी सत्ता की स्थापना हेतु किया गया था इसलिये इसे यदि हम स्वतंत्रता के संग्राम की संज्ञा दें तो अनुचित नहीं है।
सन् १८57 के विद्रोह की सबसे अधिक आकर्षक बात मुझे यह लगती है कि इसमें हिन्दू मुसलमानों ने अद्भुत एकता का परिचय दिया था। बिठूर का नाना और झांसी की रानी भी मुगल बादषाह के उसी झंडे के नीचे यह भीषण युद्ध लड़ रहे थे, जिस झंडे के नीचे शामली के मोर्च पर मुसलमान मौलवी अपना खून बहा रहे थे। दिल्ली में मुगल बादषाह बहादुरषाह जफर ने जब बकर ईद के दिन गायों की कुर्बानी पर रोक लगादी और यह ऐलान करा दिया कि अगर कोई गाय की कुर्बानी करेगा तो उसे तोप से उड़ा दिया जायेगा। तो इसका समर्थन बहुत से मौलवियों ने भी किया था। खेद यही कि इस तरह की एकता सन् 1920-21 में हुए खिलाफत और असहयोग आन्दोलन को छोड़कर फिर कभी देखने को नहीं मिली।

सन् 1857 के बाद
सन् 1857 के विद्रोह का दमन अंग्रेजों ने इतनी पाषविकता के साथ किया था कि उसके पशचत् समस्त देश  में भयानक भय व्याप्त हो गया था। लोग आपस में बन्द कमरे के भीतर भी अंग्रेजों की आलोचना करने से डरने लगे थे। इसका एक उदाहरण यह है कि जब महारानी लक्ष्मीबाई ग्वालियर से युद्ध में वीर गति को प्राप्त हुई तो उनके दत्तक पुत्र को जो 10-12 वर्ष का था रानी के स्वामिभक्त सेवक किसी प्रकार ग्वालियर से हटाने में सफल हो गये। इसके पष्चात् इन सेवकों का दल उस मासूम राजकुमार को लेकर दर दर भटकता फिरा किन्तु किसी ने भी उस बालक को आश्रय देना स्वीकार नहीं किया और उसे बहुत लम्बे समय तक जंगलों और पर्वतों में निवास करना पड़ा। मुझे इस राजकुमारी की यह कहानी महारानी लक्ष्मीबाई के प्रपौत्र श्री कृष्णाराव लक्ष्मण राव झांसी वाला से प्राप्त हुई थी जो तीन चार वर्ष पूर्व तक इन्दौर की एक कम्पनी में क्लर्की करते हुए जीवन यापन करते थे। बाद में दादा बनारसीदास जी चतुर्वेदी की कृपा से उनको तीन सौ रूपया मासिक की    पेंशन  भारत सरकार से मिलने लगी थी। अब वे स्वर्गस्थ हो चुके हैं किन्तु उनका परिवार आज भी इन्दौर में है। इस उदाहरण से यह भली भांति समझा जा सकता है कि उस समय कितना आतंक व्याप्त रहा होगा।
लेकिन साहसिक व्यक्तियों का कभी अभाव नहीं होता। जिन लोगों के दिलों  में देश  से अंग्रेजों को बाहर निकालने की आग थी, वह जल्द ही सम्हल गये और इन सम्हलने वालों में सबसे पहले लोग वे मुसलमान मौलवी थे, जिनके निकट अंग्रेजों की सत्ता का विरोध उनका धार्मिक कर्तव्य था। इन लोगों ने फिर अपने को संगठित किया और सहारनपुर के पास देवबन्द जैसे छोटे कस्बे में एक धार्मिक स्कूल की स्थापना करके अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया। इन मौलवियों के ही एक दूसरे दल ने सीमाप्रान्त के कबायली प्रदेश  में स्थित अपने केन्द्र के लिए भारत से जन धन की सहायता करनी प्रारम्भ की और हजारों लोग और लाखों रूपया उस केन्द्र को भेजा जाता रहा। यह लोग उस केन्द्र में पहुंचकर सैनिक  शिक्षा  प्राप्त करते थे और फिर अंग्रेजों की छावनियों पर आक्रमण करते थे। अंग्रेजों ने इस आन्दोलन का उल्लेख बहाबी आन्दोलन के नाम से किया है इस दल के लोगों ने भारत में भी कुछ उच्च अंग्रेज अधिकारियों की हत्या कर दी, जिनके कारण इनका भयानक दमन किया गया। अनेक मुसलिम विद्वान कालापानी भेजे गये और कुछ को फांसी भी दी गई। हजारों लोग सीमाप्रान्त में युद्ध करते हुए मारे गये। सैकड़ों लोगों की सम्पत्ति जप्त कर ली गई। यह उल्लेखनीय है कि यह आन्दोलन सन् 1947 तक किसी न किसी रूप में चलता रहा।
इसी प्रकार का एक दूसरा आन्दोलन सन् 1890 के आसपास सिक्खों में शुरू हुआ, जिसका उल्लेख इतिहास की पुस्तकों में कूका आन्दोलन के नाम से पढ़ने को मिलता है। गुरू राम सिंह नामक एक  सन्त और समाज सुधारक इस आन्दोलन के नेता थे। इस आन्दोलन में सम्मलित होने वाले ब्रिटिश  सत्ता के प्रति इतनी असहयोगी भावना रखते थे कि डाकतार और रेल का भी इस्तेमाल नहीं करते थे क्योंकि इन चीजों का सम्बन्ध ब्रिटिश  सत्ता से था। हाथ के कते सूत का हाथ से बुना कपड़ा ही वे प्रयोग में लाते थे क्योंकि इंगलैण्ड में बनी मशीनों के स्पर्श     से अपवित्र हुए कपड़े का इस्तेमाल भी उनके लिए वर्जित था। पंजाब में स्थित मैणी नामक ग्राम उनका केन्द्र था, जहां आज भी बाबा राम सिंह के उत्तराधिकारी इस पन्थ की गद्दी पर बिराजमान हैं। इस आन्दोलन को भी भयानक दमन का    शिकार  होना पड़ा। गुरू रामसिंह गिरफ्तार करके मांउले मेज भेज दिये गये। बहुत से कूका सिख तोपों से उड़ा दिये और बहुत से जेलों में बन्द कर दिये गये।


वासुदेव बलवन्त फड़के
कूका सिक्खो के   दमन काल में ही सन् 1856 के आस पास नासिक में रहने वाले एक मराठा युवक वासुदेव बलवन्त फड़के के हृदय में ब्रिटिश  सत्ता के विरूद्ध क्रोधाग्नि भड़क उठी। उन दिनों भारत के कुछ क्षेत्रों में भीषण अकाल पड़ रहा था और हजारों की संख्या में लोग भूख से मर रहे थे। फड़के यद्यपि सरकारी कर्मचारी था किन्तु वह अकाल और अकाल के कारण हुई मृत्युओं का जिम्मेदार अग्रेजों का शासन मानता था। फड़के का यह भी विशवास  था कि भारत से अंग्रेजों को निकालने के बाद इस देश  में जनता द्वारा निर्वाचित सरकार की स्थापना की जाय। ऐसे विचार उसने अपनी डायरी में लेखवद्ध किये थे जो गिरफ्तारी के समय उसके पास से बरामद हुई थी। फड़के ने पहले नगर के    शिक्षित  वर्ग में अपने साथी खोजने का प्रयास किया। किन्तु उसे निराशा  हुई। तब वह गरीब किसानों  और  आदिवासियों के क्षेत्र में जा पहुंचा और सैकड़ों साहसी लोगों को संगठित कर लिया। वह अपने दल के साथ सरकारी दफ्तरों और खजानों तथा खाद्यान्न भंडारों पर धावा बोलता था और जो कुछ लूटता था वह सब अकाल पीड़ितों में बाँट देता था। कई बार उसकी पुलिस दलों से मुठभेड़ हुई किन्तु उसे जीवित या मृत पकड़ा नहीं जा सका। इस पर बम्बई सरकार ने उसके लिये कई हजार रूपये के इनाम की घोषणा की। इसके जबाब में फड़के ने बम्बई के गवर्नर का सिर लाने वाले के लिये इनाम की घोषणा की और इस घोषणा के पोस्टर उसने जगह जगह लगवा दिये। अन्त में बड़ी कठिनाई से फड़के को गिरफ्तार किया जा सका। गिरफ्तारी के समय उसे तेज बुखार था और एक मंदिर में अकेला पड़ा हुआ था। फड़के पर मुकदमा चला और उसे अदन भेज दिया गया। एक बार अदन की जेल से भी भागने में सफल हो गया, लेकिन उस अनजाने देश  में वह फिर पकड़ लिया गया और उस जेल में ही कुछ समय बाद उसका देहान्त हो गया।
जब फड़के की गतिविधियां चल रही थी तब ई.पी. मिनाएव नामक एक रूसी विद्वान भारत आया था और उसने अपने यात्राओं का विवरण पुस्तक रूप में  प्रकाशित   किया है। मिनाएव ने अपनी पुस्तक में फड़के का भी उल्लेख किया है और उसकी जीवन कथा तथा मुकदमे के विवरण में अपनी रूचि प्रकट की है। इससे  समझा जा सकता है कि फड़के को उस समय कितनी प्रसिद्धी मिली होगी।

लार्ड मेयो की हत्या
इन दिनों ही अन्डमान में भारत के बायसराय लार्ड मेयो की हत्या शेर अली नामक एक पठान कैदी ने कर दी।  कुंवर मुहम्मद अशरफ जैसे प्रामाणिक इतिहाज्ञों का कथन है कि लार्ड मेयो की हत्या का षड़यंत्र उन बहावी  मौलवियों द्वारा रचा गया था, जो पटना के अत्यन्त सम्पन्न परिवार के थे और सीमा प्रान्त स्थिति विद्रोही केन्द्र के सहायक होने के कारण उस समय अण्डमान में आजीवन कारावास का दंड भुगत रहे थे। यह भी एक बड़ी राजनीतिक घटना थी।

महर्षि दयानन्द सरस्वती
इसी समय देश  में महर्षि दयानन्द सरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ और उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। कुछ आर्य समाजी विद्वानों ने पिछले कुछ समय से ऐसे लेखादि लिखने प्रारम्भ किये हैं जिनमें यह स्थापना की गई है कि महर्षि दयानन्द सरस्वती तथा उनके गुरू स्वामी विरजानन्द जी का सन् 1857 के विद्रोही नेताओं से सम्बन्ध था। अभी इस स्थापना को इतिहासज्ञों ने पूरी तरह मान्यता नहीं दी है। फिर भी महर्षि ने अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाष में यह लिखकर कि  विदेशी    शासन चाहे कितना ही न्यायप्रिय और प्रजावत्सल हो, अपने राज्य से उत्कृष्ट नहीं हो सकता, स्पष्ट कर दिया है कि वे भारत में ब्रिटिश  शासन के विरोधी थे। अतः सम्भव   है   कि महर्षि दयानन्द सरस्वती सन् 1857 के विद्रोह से सम्बन्धित रहे हों। इतना तो   निशचित   है कि आर्य समाज के अनेक प्रसिद्ध नेता और कार्यकर्ता देश  की आजादी की लड़ाई में अग्रगन्य रहे। इनमें से स्वामी श्रद्धानन्द और लाला लाजपत राय का नाम हम सभी जानते हैं और काकोरी केस में फांसी पाने वाले चार शहीदों में से दो श्री रामप्रसाद  विस्मिल और ठाकुर रोशन सिंह भी आर्य समाज के द्वारा ही राष्ट्र सेवा की ओर आकर्षित हुए थे, यह एक प्रामाणिक तथ्य है l  इस प्रकार आर्य समाज आन्दोलन ने भी राष्ट्र के स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया है इसे स्वीकार किया जाना चाहिए।
आर्य समाज की ही भांति उन दिनों प्रार्थना समाज, ब्रह्म समाज जैसी संस्थायें भी स्थापित हुई। यह  धार्मिक संगठन थे किन्तु इनके माध्यम से कुछ महानुभाव एक स्थान पर एकत्रित होकर देश  समाज एवं जाति की समस्याओं पर विचार विनिमय करें ऐसी पद्धति का प्रचलन हुआ। इससे सार्वजनिक जीवन  का विकास हुआ और स्वतंत्र चिन्तन प्रारम्भ हुआ, इसलिए इन संस्थाओं की रचना उल्लेखनीय है।
इन दिनों ही कुछ राज्यों में ऐसी संस्थायें भी संगठित हुईं जो प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक थीं। उदाहरण के लिए बंगाल में श्री सुरेद्रनाथ बनर्जी के प्रयास से इंडियन एसोशिएसन  की स्थापना हुई थी। इन संस्थाओं के द्वारा भारतीय जनता के नागरिक अधिकारों पर विचार किया जाने लगा था। भारतीय शासन पद्धति में सुधार के लिए सुझाव दिये जाने लगे थे। कभी कभी अत्यन्त नम्र शब्दों में किसी सरकारी नीति की आलोचना भी कर दी जाती थी लेकिन इसके साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया जाता था कि हम पूरी तरह राजभक्त हैं और ब्रिटिश  शासन को भारत के लिए कल्याण प्रद मानते हैं। इस समय तक ऐसी पत्र पत्रिकायें भी देश  में निकलने लगी थीं, जिनका संचालन भारतीयों के हाथ में था। उस समय पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन व्यापार नहीं था, बल्कि  देश  सेवा  और संकटों को आमंत्रण देना था। अंग्रेजों और ऐग्लोइंडियनों द्वारा संचालित पत्रों और भारतीयों द्वारा संचालित पत्रों में प्रायः विवाद प्रारम्भ हो जाते थे, क्योंकि दोनों प्रकार के    पत्रों  के दृष्टिकोणों में भारी अन्तर था। अंग्रेजों और एंग्लोइंडियनों के पत्र उन भारतीयों के प्रति प्रायः विष उगलते रहते थे जो शासन व्यवस्था की आलोचना करने का साहस करते थे। अंग्रेजों के पत्रों का रूख लगभग ऐसा था कि यदि भारतीय कुछ चाहते हैं तो उनको भिखारियों और दासों की भाषा में गिड़गिड़ाते हुए मांगना चाहिए और अधिकार तथा कानून की बात नहीं करनी चाहिए।
आर्य समाज ब्रह्म समाज और प्रार्थना समाज जैसी संस्थाओं ने भारतीयों के मनोबल को ऊँचा किया और उन्होंने अनुभव किया कि उनका अतीत ऐसा शानदार रहा है, जिस पर वे उचित गर्व कर सकते हैं। इसके अन्तर्गत ऐसी भावना भी विद्यमान थी कि अंग्रेज जाति यद्यपि इस समय सत्ता में है और विशव्  में उसे   सर्वाधिक शक्तिशाली माना जाता है। आध्यात्मिक क्षेत्र में, संस्कृति तथा साहित्य में वह इस समय भी भारतीयों के समकक्ष नहीं है। और भारतीय प्रयास करने पर पुनः उनसे अधिक उन्नतिशील हो सकते हैं। स्वामी रामकृष्ण, परमहंस, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, महादेव गोविन्द रानाडे, रामकृष्ण भंडार कर जैसे भारत के सुपुत्रों को यह श्रेय प्राप्त है कि उन्होंने अपनी विद्वता कर्मठता और निर्भीकता से भारतीयों के हृदय में श्रेष्ठत्व की इस भावना का संचार किया। राजा राम मोहन राय इससे पहले पीढ़ी के थे और वे भारतीय जन मानस को प्रभावित करने तथा झकझोरने में अपने जीवन के अमूल्य वर्षो को समर्पित कर चुके थे। मुसलिम समाज में यह कार्य शाहवलीउल्ला और उनके पुत्र शाह अब्दुल्ला अजीत ने किया था यद्यपि उनका दृष्टिकोण इनसे भिन्न था।
भारतीयों में व्याप्त इस नव जागरण का परिणाम यह हुआ कि उस समय शासन द्वारा अंग्रेजों और भारतीयों के बीच जो भेदभाव पूर्ण व्यवहार किया जाता था, उसका विरोध करने लगे।  भारतीयों की इस भावना को मान्यता देते हुए ही सन् 1883 में वाइसराय लार्ड रिपन की कौंसिल के एक सदस्य लार्ड इलबिर्ट ने  एक बिल पेश  किया, जिसके अनुसार भारतीय मजिस्ट्रेट भी फौजदारी के मुकदमें से सम्बन्धित अंग्रेज अभियुक्तों को दंड दे सकते थे। इस बिल का भारत स्थित अंग्रेजों और एंग्लोइंडियनों  ने  इतना घोर विरोध किया कि इलवर्ट को यह बिल वापस लेना पड़ा। बताया जाता है कि इस बिल के प्रति भारत स्थित अंग्रेजों की भावना     इतनी  उग्र थी कि उन्होंने वायसराय को जबरदस्ती एक जहाज में डालकर इंगलैण्ड भेज देने का     षड़यंत्र  भी रचा था। इस बिल काण्ड  ने  उस समय भारतीयों और अंग्रेजों के मध्य भीषण कटुता पैदा  कर दी थी जिसके परिणाम स्वरूप कुछ भारतीयों ने गुप्त समितियां बनाकर अंग्रेजी सत्ता को शस्त्र बल से हटाने की दिशा  में विचार करना प्रारम्भ कर दिया था। ऐसी ही समितियों ने आगे चल कर भारत में विल्पवी आन्दोलन को जन्म दिया जिसके कारण हजारों भारतीय शहीद हुए।

काँग्रेस की स्थापना
उस समय भारत में कुछ उदारवादी दृष्टिकोण के अंग्रेज इस परिस्थिति को बड़ी चिन्ता की दृष्टि से देख रहे थे। इन अंग्रेजों में एक थे मि. ह्यूम, जो सन् 1857 की क्रान्ति के खूनी दिनों में उत्तर प्रदेष के एक जिले में कलक्टर थे। कहा जाता है मि. ह्यूम को ऐसी सूचनायें प्राप्त हुई थीं जिनके अनुसार भारत में एक भीषण विद्रोह पुनः प्रारम्भ होने वाला था। यह सूचनायें सात बड़ी पुस्तकों में संग्रठित थीं और इनमें भारत के प्रत्येक प्रान्त और प्रत्येक जिले की ऐसी     हलचलों का       विवरण  था। ह्यूम की चिन्ता इस जानकारी से और भी बढ़ गई। उन्होंन तत्कालीन वायसराय से मंत्रणा की। ह्यूम का विचार था कि भारत के प्रतिभाशाली और देशभक्त नागरिक यदि एक मंच पर एकत्रित तो कर सरकार को यह बताते रहे कि भारतीय क्या चाहते हैं तो भारतीयों के  ह्रदय  में अंग्रेजों के प्रति ऐसा विशवास उत्नन्न हो सकता है कि वे वैध रूप में भी अधिकार प्राप्त कर सकते हैं। इससे भारतीयों के हृदय में उत्पन्न होती जा रही विद्रोही प्रवृत्ति पर अंकुष लगेगा और इससे सरकार को सुविधा होगी।
इसी विचार के अनुसार सन् 1885 में बम्बई में कांग्रेस की स्थापना की गई। सरकारी क्षेत्रों में भी इस संस्था की स्थापना का ऐसा उत्साहपूर्ण स्वागत किया गया कि जब सन् 1886 में कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन श्री दादा भाई नौरोजी की अध्यक्षता में कलकत्ता में हुआ तो तत्कालीन वायसराय लार्ड उफरिन की ओर से अधिवेशन में पधारने वाले सभी प्रतिनिधियों को     प्रीतिभोज  दिया गया था। कांग्रेस के तीसरे अधिवेशन में भी मद्रास के तत्कालीन गवर्नर ने स्वतः उपस्थित होकर इस संस्था की स्थापना को सरकार के अनुकूल तथा समर्थित सिद्ध किया था। किन्तु कांग्रेस का चौथा अधिवेशन जब इलाहाबाद में संयोजित किया गया तो स्थिति दूसरी थी। सरकार की ओर से प्रयास किया गया कि  कांग्रेस का अधिवेशन हो सके ऐसा कोई स्थान कांग्रेसजन प्राप्त न कर सकें। पंजाब में हजारों लोगों से ऐसी जमानत तलब की गई कि वे कांग्रेस अधिवेशन में सम्मिलित नहीं होंगे। फिर भी अधिवेशन हुआ और इसे साधारण जनता ने कांग्रेस की सरकार पर विजय के रूप में ग्रहण किया। कहा जा सकता है कि यहीं से कांग्रेस और ब्रिटिश  सरकार में परस्पर विरोध उत्पन्न हुआ।
इसी युग में भारत के सार्वजनिक जीवन में दो ऐसे महान् पुरूषों का प्रादुर्भाव हुआ, जिनके विचार एक दूसरे के सर्वथा विपरीत थे। यह दो व्यक्ति थे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, जो सरकारी की नीतियों    की  कठोर आलोचना करते थे और दूसरे थे सर सय्यद अहमद खां, जो अंग्रेजों के राज को भारत के लिये सौभाग्य और वरदान का विषय मानते थे। दोनों ही महानुभाव परम विद्वान और अत्यधिक प्रभावशाली थे। दोनों ने ही देश  और जाति की सेवा के लिये अपने को समर्पित कर दिया था। स्वभावतः तिलक को भारत की हिन्दू जनता में अभूतपूर्व लोक प्रियता प्राप्त हुई। यद्यपि भारत के सहस्त्रों मुसलमान जिनमें एक श्री मुहम्मद अली     जिन्ना  भी थे, तिलक के पूर्ण रूप से भक्त थे। सर सय्यद मुसलमानों के अभिजात्य वर्ग में, नबाबों और रईसों में विशेष प्रभाव रखते थे। अलीगढ़ में मुसलिम विश्व  विद्यालय की स्थापना कर उन्होंने मुसलमानों में और भी लोक प्रियता प्राप्त कर ली थी। यह कहा जा सकता है कि आगे चलकर भारत का जो विभाजन हुआ और पाकिस्तान का निर्माण हुआ उसके बीज इसी समय भारतीय राजनीति में पड़े। आशचर्य की बात केवल यह है कि पाकिस्तान आन्दोलन के    नेतृत्व का श्रेय  जिन्ना को प्राप्त हुआ जो उस समय उस इस प्रकार के विचारों के घोर विरोधी थें
 19 वीं शताब्दी के अन्तिम वर्षो में भारतीय राजनीति इस रूप में आ गई थी कि कुछ उत्साही युवक देशभक्ति का जयघोष करते हुए फांसी पर चढ़ने लगे थे और तिलक जैसे नेता सरकारी नीतियों का उग्र विरोध करते हुए जेलजाने लगे थे।   विदेशी  सत्ता के विरूद्ध लड़ाकू राजनीति का या कहना चाहिए लड़ाकू जन आन्दोलनों का सूत्रपात 19वीं शताब्दी के अन्त तक हमारे देश  में हो चुका था। इसके बाद की कहानी बहुत घटना पूर्ण और इससे अधिक  विस्तृत है।
   (यह आलेख स्व. श्री रतन लाल बंसल का १९८० में एक सभा में दिया गया अप्रकाशित भाषण है l फिरोजाबाद निवासी श्री बंसल ने स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लिया और जेल भी गए l उन्होंने ३७ पुस्तके लिखी l ''तीन क्रन्तिकारी शहीद '' और रेशमी पत्रों का षड़यंत्र '' पुस्तकें अंग्रेजी जमाने में प्रतिबंधित हुईं ल स्व. श्री बंसल भारत में अंग्रेजी राज के लेखक प. सर सुन्दर लाल के साथ रहे .आजादी के बाद कौमी एकता के लिए जीवन भर काम किया. प. बनारसी दस चतुर्वेदी के साथ क्रान्तिकारियो के परिजनों के लिए सुख सुविधा जुटाने के साद कार्य में रूचि लेते रहे . यह लेख आजादी के आन्दोलन   की एक झलक है और उसके  असल चरित्र को समझने में मदद करता है l )

Friday, January 13, 2012

माया को मिला मुद्दा


            व्यंग
माया को  मिला   मुद्दा
अशोक बंसल
जंगल दक्षिण अफ्रीका के हों या सुंदरवन के ,सभी जगह  के जानवरों को भनक लग गई कि उ.प्र. में विधान सभा के चुनावों  की तैयारी चल रही हैं और चुनाव आयोग ने आचार संहिता की रक्षा के नाम पर हाथियों की मूर्तियों को बड़ी बेदर्दी से कपड़ों और त्रिपालों में लपेट दिया  है l जंगल के जानवर इंसानों  के जंगलीपन से पहले से दुखी थे l  ऊपर से बैठे -ठाले कलेजे में खंजर और खोंप दिया l बैठक बुलाने की नीयत से गगन भेदी आवाजें निकाल कर जानवरों ने इंसानों की  इस नई करतूत की खबर दूर दूर तक फैला दी l  चड्डी पहनने वाले जंगल के मसीहा मोगली को जैसे ही यह खबर लगी वह पेड़ दर पेड़ कूदता -फांदता  सभा स्थल पर आ पहुंचा l  मोगली के कपोलों पर आंसू की बूंदें लुढ़क रही थीं ,कुछ खूंखार जानवर अपने नथुने फडफडा कर नेताओं  के खून पीने को मानो मचल रहे थे l  अमन चैन के पुजारी ये जानवर इंसानों की हैवानियत की शिकायत किससे करें l
आजादी के ६४ सालों में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि पार्कों में चुपचाप खड़े  हाथियों पर मोटे मोटे तिरपालों को डाला गया हो l जानवरों को इंसानों की हाथी विरोधी मुहिम के पीछे घटिया राजनीति की दुर्गन्ध लग रही थी l बैठक में मौजूद शेर ,तेंदुए और भालू जैसे जानवर भयानक चहरे बनाकर और हवा में अपने पंजे लहरा कर ढके हुए हाथियों की मुक्ति के लिए शहर कूच करने का सुझाव देने लगे l लोमड़ी ,चूहा जेसे जानवर नहीं चाहते थे कि शातिर नेताओं  से भरे  प्रदेश में हाथी मुक्ति अभियान छेड़ा जाय l
आखिर में मोगली का सुझाव सबको पसंद आया कि हाथिओं की रहनुमा मायावती को जंगल बुलाकर अपने दुःख दर्द में साझी बनाया जाय l शहर के संपर्क में रहने वाले एक बन्दर ने सचेत किया कि ओहदे वाले नेताओं   के पास  खाली हाथ जाना असभ्यता है l इतना सुनते ही जानवरों ने जंगल में  पेड़ों पर लगी मीठे मीठे फलों की वेशकीमती संपदा इकठ्ठी की और  प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के पास पहुंचा दी l
माया अपने उड़न खटोले में पलक झांपते पहुँच गयीं l मोगली माया के पास मंच पर बैठा l चहरे पर तनाव पर वाणी में भावुकता बटोरकर माया ने कहा ''   मैं    हाथी के दम पर जिन्दा हूँ और हाथी के दम पर मरूंगी l मेरे हाथी पर राहुल बाबा के कहने पर पर्दा गिराया गया है l इससे पूरे जंगल का अपमान हुआ
है l  आप चिंता न करें l मुझे इस चुनाव में मुद्दा मिल  गया है l चुनावी सभाओं में मैं  विरोधिओं की  बखिया उधेड़ दूंगीं l '' माया ने वायदा किया कि ''यदि नतीजे पिछले चुनाव जैसे  रहे तो हर जिले  में हाथी गेट होंगे ,चुनाव जीतने पर पार्कों में विजय दिवस मनाये जायेंगे जिसमें जंगल का हर जानवर  मौजूद  होगा ''
माया की तकरीर पर जानवरों के कालेजों में ठंडक पड़ी l  हाथियों ने सूंड उठाकर ऐसी  जोरदार चिंघाड़ लगाई कि  माया को विजयश्री नतीजे आने से पहले दिखाई देने लगी  l 
---------------------------------------अशोक बंसल ९८३७३१९९६९                                

Monday, December 19, 2011

रानी झाँसी का किला

झाँसी के किले के रखरखाव में पुरातत्व विभाग द्वारा बरती जा रही उपेक्षा से सैलानिओं को आधी अधूरी जानकारी मिल रही है ,साथ ही विभाग को आर्थिक हानि उठानी पड़ रही है. किला कितना ही छोटा क्यों न हो रानी झासी के शौर्य और पराक्रम का मूक गवाह है. अनेक लोग रानी को स्वतंत्रता सैनानिओं की फेहरिस्त  में रखने से मना करते है क्यों कि रानी अपनी झासी के लिए लड़ी थी न कि फिरंगिओं को देश से भगाने के लिए. ऐसे  लोग भूल जाते हैं कि फिरागिओं के अत्याचार,  तिकड़मों के द्वारा राजाओं की सत्ता को हडपना  आदि अनाचारों का प्राण हथली पर रख कर विरोध करना भी देशभक्ति  है.. २३ साल की उम् में रानी शहीद हुई.
दामोदर राव को गोद  लेने  की घटना के बाद झाँसी में वबाल मचा .अंग्रेजों ने राज्य हडपने की योजना बनाई और आक्रमण किया.
पूना का एक गरीव ब्रह्मण उन दिनों झाँसी में था. १८ दिनों झाँसी को किला फिरंगिओं से घिरा रहा .विष्णु भट्ट गोडसे नामक एस ब्रह्मण ने रानी के शौर्य और पराक्रम को देखाथा. बाद में उसने एक पुस्तक लिखी. और इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद मांझा प्रवास नाम से श्री अमृत लाल नगर ने किया है. इस पुस्तक को जो कोई पढ़ेगा रानी को  सही सही और गहरे से समझ पायेगा.
पुरातत्व विभाग ने किले को और आकर्षक बनाने के लिए कोई प्रयास नहीं किये हैं. किले के अन्दर कालकोठरी बंद पड़ी है. इस कोठरी में अग्रेजों ने न जाने कितने स्वतंत्रता  सैनानिओं को फँसी पर लटका दिया था. इन गुमनाम शहीदों के नाम पर एक पट्टिका जरुरी है.
यदि आप देश के अतीत से लगाव रखते  है तो एक दिन परिवार के साथ झाँसी रानी का किला देखने और जिन्दगी को समझने जरूर जांए .
 

 

Monday, December 12, 2011

एक संस्मरण

 
यादों के सहारे
अशोक बंसल

वृध्द  होने पर इन्सान में भौतिक और पारलौकिक   में भेद करने की ललक पैदा  होती है. आस्था जैसे   टी.वी.चैनेल भले लगने लगते हैं. वक्त काटने के लिए पूजा -पाठ में ज्यादा से ज्यादा रम जाना उसे अच्छा लगता है.सांसारिक  लोगों  की एकाकी लोगों के लिए यही  सर्वोत्तम सलाह भी है. पर ८५  बसंत देख चुकी और छब्बीस  बरस पूर्व मित्र जैसे  पति का साथ हमेशा- हमेशा के लिए छोड़ चुकी कनक चाची  का जीवन दर्शन कुछ और ही है. कनक चाची  ने अपने पति  आत्मप्रचार से दूर रहे  लेखक और अनुवादक स्व० प्रकाश चन्द्र चतुर्वेदी के साथ पत्रकार शिरोमणि दादा बनारसीदास चतुर्वेदी की सेवा में वर्षों गुजारे. पति की म्रत्यु क बाद कनक चाची फिरोजाबाद छोड़कर मथुरा आ गयीं. 
प्रकश चाचा के जाने के बाद पिछले २६ सालों से चाची यादों के सहारे जी रही हैंइ  यादोमें फिरोजाबाद और टीकमगढ़  में लम्बे समय तक प्रवास करने वाले मामा बनारसीदास चतुर्वेदी  और   इतिहास में दर्ज तमाम महापुरुषों के रोचक किस्से और   प्रकाश  चाचा  की साहित्यिक गतिविधियाँ और ठहाके वाली ठिठोलियाँ शामिल हैं. दादाजी के फिरोजाबाद के घर में क्रान्तिकारियो का आवागमन बराबर बना रहता था .चाचीजी बताती हैं कि काला पानी की सजा काटने वाले बाबा प्रथ्वी सिंह आजाद   ,शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की बहिन ,शहीद चंद्रशेखर आजाद की माताजी ,शिव वर्मा आदि प्रसिद्ध लोग दादाजी के पास आते ही न थे वल्कि कई कई दिन घर में रहते थे. कनक चाची इतिहास के इन  पन्नों  के बीच चलती फिरती हैं ..इन यादों को चाचीजी कलेजे में समेटे हुए है. बुढ़ापे में इंसान के सठिया जाने का खतरा रहता है.चाचीजी इस रोग  से मुक्त  हैं.सामने वाला यदि साहित्य या क्रातिकारी आन्दोलन में रूचि रखता है तभी वह अपनी यादों के   पन्नों को पलटती हैं.  चाचीजी को याद है कि बाबा प्रथ्वी सिंह ने २५ साल छोटी लड़की से शादी की थी.चाचीजी  बाबा प्रथ्वी सिंह की पत्नी से खूब  घुल मिल गईं , दोस्ती हो गई.चाचाजी खान हैं किस्सों की.ये किस्से महान लोगों के हैं ,चाचीजी के निजी जीवन के कतई नहीं. अपनी   कृशकाय काया के कष्टों का जिक्र तो चाचीजी पूछने पर भी नहीं करती.
दादाजी "विशाल भारत "  (कलकत्ता ) के संपादक  रहने के बाद टीकमगढ़ आ गए  थे. प्रकाश चाचा   ने दादाजी के कहने पर अमेरिका के   लेखक हेनरी डेविड थोरो की पुस्तक 'वाल्डेन' का  हिंदी अनुवाद किया . महात्मा गाँधी ने इस पुस्तक के बारे में लिखा है कि थोरो ने उनके जीवन को प्रभावित किया. चाचीजी  कहती है कि  इस पुस्तक क अनुवाद करने के लिए  प्रकाश  सुबह ४ बजे जाग जाया करते थे. हिंदी के उपयुक्त शब्दों कि तलाश में शब्दकोष  से माथ्थापच्ची करते  करते दादाजी के साथ ठहलने निकल जाते थे.  स्व० राष्ट्रपति  राजेंद्र प्रसाद ने दादाजी को राज्यसभा में सदस्य मनोनीत करने से पहले क्या वार्तालाप किया , सी .एफ. एंड्रूज  और गांधीजी के साथ दादाजी के  अनेक किस्से आदि  चाचीजी को याद हैं.  एक दिन मैं चाचीजी की मेज पर रख्खी थोरो की 'वाल्डेन' पढने के लिए मांग लाया .पुस्तक वापस करने में मुझे देरी हो गयी. चाचीजी ने मोबाईल पर तकादा करना शुरू कर दिया. मैं जब पुस्तक लौटने गया तो चाचीजी  ने भावुक स्वर में कहा कि ''अशोक ,बुरा मत मानना .अलमारी में रख्खी ये पुस्तके और हाथ के लिखे कागजों के पुलंदे तुम्हारे चाचा की धरोहर है.मैं इनके बीच चलती फिरती हूँ ,जीती हूँ तो मुझे अपार सुख मिलता है. इन यादों के सहारे मैंने २६ बरस ख़ुशी ख़ुशी गुजार दिए.
_______________________________________-अशोक बंसल,१७ बलदेव पूरी एक्स.मथुरा  मो.9837319969,


Friday, December 9, 2011

           
 व्यंग

बंद लिफाफे की माया
अशोक बंसल
  लिफाफे में रखी चीज को जानने की जिज्ञासा सदैव  से रही है.एक वक्त एसा था जब शातिर दिमाग बंद लिफाफे में  रखे मजमून  को भांप लेने में माहिर थे.अब  लिफाफे  और मजमून का कोई सम्बन्ध  नहीं रहा है.लिफाफे   में माया रखने का युग आ गया है. लिफाफा गिफ्ट का पर्याय बन गया है. जन्मदिन,सालगिरह या शादी कोई भी आयोजनक्यों  न हो  ,निमंत्रण मिलते ही भद्र पुरुष मुद्रायुक्त लिफाफा 
ले दावत उड़ाने निकल पड़ते हैं. 
  मेरे शहर  के एक मंत्री की बेटी की शादी में चाट -पकोड़ी  के दर्जनों स्टाल के मध्य एक स्टाल लिफाफों का था. इस स्टाल पर मंत्री के दो खास लोग मेहमानों द्वारा दिए लिफाफों का  हिसाब किताब देख रहे थे. एक व्यक्ति लिफाफा थाम  रहा था तो दूसरा एक रजिस्टर में लिफाफा में रखी रकम गिन गिन कर नोट कर रहा था. लिफाफों वाले स्टाल पर लगी भीड़ मंत्रीजी की लोकप्रियता मानी जा रही थी.
 शादी में दरवाजे पर मेहवानों के स्वागत में खड़े  मेजबान की कोट -पेंट की सभी जेबों में ठुंसे लिफाफों को देख खुद के किसी होटल में आने का आभास होता है.फर्क सिर्फ इतना है की इस  होटल 
में खाने का सामान मेजवान की मर्जी का और पेमेंट मेहमान  की इच्छा पर निर्भर करता है.
 मुझे अपने एक मित्र की रोनी सूरत की आज भी याद है  .मित्र अपनी बेटी की शादी में मेहमानों के दिए लिफाफे लेले कर जेब में  ठूंस  रहा था. 
अगले दिन हिसाब लगाने पर मालूम हुआ कि कई लिफाफे गायब थे. ऐसा ही एक किस्सा मुझे याद है. मित्र ने लिफाफे रखने की जिम्मेदारी अपनी सजी धजी पत्नी को दे रखी थी. पत्नी को अपनी साड़ी के गेट अप की चिंता थी सो लिफाफे का थैला मालकिन ने नोकरानी को दे दिया .
मेहमानों की भीड़ में नोकरानी  कहाँ खो गई  कि आज तक नहीं मिली है. लिफाफे की माया ने प. सुखराम  पर जो गुजारी है ऐसा कहर भागवान किसी पर न ढाए.किस्सा रोचक होने  के साथ भीभ्त्स भी है. सुखराम को मित्र की बेटी की शादी में शहर के शानदार होटल में जाना था .सूट पहनने से पूर्व सुखराम ने  लिफाफा तैयार किया .गेट पर खड़े मित्र को बधाई  और लिफाफा   दोनों  थमा दिए और फिर मेज पर सजे भोजन पर टूट पड़नेतैयार हो गए .मेहमानों ने आधाअधूरा खाया था कि रिवाल्वर धारी एक दरोगा की आवाज हवा में गूंजी.''कोई हिलेगा नहीं,होटल का गेट बंद  कर दिया गया है. गिफ्ट के लिफाफे का थैला गायब है. आप सब की तलाशी होगी. ''   
मेहमानों के होश फाकता  हो गए .डीजे पर  थरकते पैरों में बेड़ियाँ पड़ गयी,महिलाओं की अंगुलियाँ सब्जी में डूबी की डूबी  रह गयीं.  गेट पर दरोगा मेहमानों की तलाशी लेने में मश्गूल था. देर से आने वाले मेहमान  होटल में प्रवेश  पाने से पहले  किसी बड़े संकट की गंध पा फूट लिए.  
सुखराम सोच रहे हैं कि लिफाफे में बंद मजमून ने कभी  किसी को इतने  बड़े संकट में नहीं डाला जितना लिफाफे में बंद माया ने. 
 -----------------------------------------अशोक बंसल,१७ बल्देव्पुरी एक्सटेंशन ,मथुरा  9837319969