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Tuesday, March 16, 2010

अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता

    चचा सुखराम की स्कूली शिक्षा न के बराबर है लेकिन उनका दिमाग गजब की विश्लेषण क्षमता रखता है। यही कारण है कि उनके इर्दगिर्द पढ़ेलिखों की भीड़ सदैव रहती है। बहुत सी बातें बहुतों की समझ में नहीं आती पर इहें समझना चचा के लिए मानो बच्चों का खेल है।खचाखच भरी बैठक में कहावतों पर बात चल रही थी। चचा का कहना था का शानदार और जानदार कहावतों को गढ़ने वाले विद्वान ही नहीं होते बल्कि बिना डिग्री वाले लोग कहावतों को जन्म देकर समज को रोशनी दिखाते हैं।
इसके बाद चचा मुख्य बात पर आए। बोले- 'मैंने अपने इलाके के विधायक पिद्दीलाल से पूछा कि तुम अपनी जनता से वोट बड़ी विनम्रता से माँगते हो, षानदार जीत हासिल करते हो लेकिन कुर्सी मिलते ही ऐसे ऑंखें फेर लेते हो जैसे जानते ही नहीं।' इस पर विधायक जी बोले- 'देखो चचा ! चुनाव में वोटर हमारी बड़ी दुर्गति करता है। हम घर-घर जाते हैं, हाथ जोड़ते हैं, पैर पकड़ते हैं। किसी को चाची, किसी को माताजी,किसी को बहनजी तो किसी को बूआजी कहकर अपनी जुबान सुखाते हैं तब जाकर उनके कलेजे में समाकर जीत हासिल करते हैं।छोटीसी मषीन का नन्हा सा बटन दबाने में वोटर की मानो नानी मरती है। चचा ! अब आप ही बताओ। एक भलामानस हारने पर गाली देगा और जीतने पर मुंह फेरेगा कि नहीं। अपुन का सिध्दान्त है 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता।'

विधायक पिद्दी की कहावत में तर्क की कोई कमी नहीं थी सभी को भाया। चचा बोले-'एक किस्सा और सुनो। '
यह बात उच्च शिक्षा के कामयाब दुकानदार की है। कई इंजीनियरिंग कालेज का मालिक है वह। विधायक पिद्दी का यार है सो उसकी कहावत को सीने से लगाए फिरता है। एक दिन बोला कि ' मैं अपने कालेज में 7-8 हजार में मास्टर रखता हूं। ये मास्टर 4-5 वर्ष में तरक्की पाकर 13-14 हजार तक पहुँच जाते हैं। तब मास्टरों का यह वेतन मेरी आंखों में खटकने लगता है। उन्हें नौकरी से निकालने का फैसला कर लेता हूँ। कालेज से निकालने से 6 माह पूर्व उसकी कमियां निकालना, मीमो थमाना, डांटना-डपटना षुरू कर देता हूं। इतना टेंशन देता हूं कि वह खुद बखुद इस्तीफा देकर नौ-दो ग्यारह हो जाता है। उसके जाने के बाद मैं उसकी जगह 7-8 हजार पर फिर से नियुक्ति कर लेता हूं। यह सब 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता' के सिध्दान्त पर करता हूँ।

चचा ने अफसरों, अपने नजदीकी रिश्तेदारों, पड़ोसियों, मित्रों के ऐसे अनेक किस्से सुनाए जो विधायक पिद्दी की कहावत पर अमल कर तरक्की की चौपड़ पर कुलांचें मार रहे हैं। बैठक में बैठे कई लोग पछता रहे थे कि विधायक पिद्दी को उन्होंने गुरू क्यों नहीं बनाया। चचा ने अपनी वाणी को विराम इस नैतिक सलाह से दी- 'निजी उत्थान करना है तो उठते-बैठते इस कहावत का जाप करो और मिलजुल कर समाज का भला करना है तो जैसे वैष्णों देवी के दर्षन के लिए चढ़ाई करते भक्तजन उद्धोष करते हैं 'जोर से बोलो जय माता की ', वैसे ही सुबह पार्क में और षाम को गली मोहल्लों में नारे लगाओ, 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता।'


































Saturday, February 13, 2010

स्कूल ऑफ लीडरशि‍प



     मेरे मित्र ने खबर दी कि केंद्र सरकार शीघ्र ही जिला स्तर पर एक नायाब किस्म का स्कूल खोलने जा रही है। शि‍क्षा के विस्तार की सूचना पर मैं हर्षित था पर नायाब शब्द पर मैं चौंक पड़ा। तब मित्र ने स्पष्ट किया कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का लोकतंत्र कभी-कभी समुद्र में आए तूफान में फंसे जहाज की तरह डगमगाने लगता है। ऐसे में लोकतंत्र की मजबूती के लिए नेताओं के शि‍क्षित होने की जरूरत है। मित्र ने बता दिया कि शि‍क्षा से उसका आशय किसी विश्‍वविद्यालय की डिग्री या पी.एच.डी. से नहीं है। बल्कि उन गुरू-मंत्रों को सिखाने से है जिनमें पारंगत होने पर नेता के मन में छिपे मंसूबे को न तो जनता जान पाएगी और न ही टी.वी.-अखबार वालों को इसकी भनक लगेगी।
 
  शि‍क्षा के इस नवीन मन्दिर का नाम होगा 'स्कूल ऑफ लीडरशि‍प'। 'स्कूल ऑफ लीडरशि‍प' को नेता उत्पादक कारखाना भी कह सकते हैं।
   
 जनता नेताओं के व्यवहार से दु:खी है। सड़क हो या घर, विधानसभा हो या संसद, इन सभी स्थानों पर नेताओं द्वारा प्रदर्शि‍त ऊटपटाँग व्यवहार से नेतागिरी के धन्धे की साख गिरी है। लीडरशि‍प स्कूल के पाठयक्रम में ऐसी षिक्षा का शामिल किया गया है जिससे नेताओं के खाने कमाने के धन्धे पर कोई चोट न पड़े और दुनिया के सामने वे एक चरित्रवान, ईमानदार और देशभक्त नेता के रूप में जाने जाँए। पर्दे के पीछे के सच को छुपाने में वे माहिर बन जाँए।
 

 टी.वी. और अखबार वाले लोकप्रिय नेताओं की इसी कमजोरी का लाभ उठा रहे हैं। पत्रकारों द्वारा नेताओं के लिए किए गए 'स्टिंग ऑपरेशन' ने भारतीय लोकतंत्र की छवि को बेहिसाब चोट पहुँचाई है। पाठयक्रम में 'स्टिंग ऑपरेशन से कैसे बचें' विषय पर पूरा चेप्टर ही नहीं होगा बल्कि अनेक सेमीनार, भाषण आदि होंगे। इन आयोजनों में 'स्टिंग ऑपरेशन' में फंस चुके नेताओं को विशिष्ट अतिथि के रूप में बुलाकर उनके अनुभवों का लाभ उठाया जाएगा।

  'स्कूल ऑफ लीडरशि‍प' में फिलहाल दो ही कोर्स प्रारम्भ किये जाऐंगे। एक वर्षीय डिप्लोमा और दूसरा दो वर्षीय डिग्री कोर्स। एक वर्षीय डिप्लोमा में गाँव और शहर की नेतागिरी के प्रारम्भिक दौर की ऊँच-नीच सिखाई जाएगी जबकि डिग्री कोर्स में विधायक और सांसद के सपने देखने वाले नेताओं की शि‍क्षा का प्रबन्ध होगा।
 

 मेरे मित्र ने डिप्लोमा और डिग्री दोनों कोर्स की फीस भी निर्धारित की है। फीस लेने में उदारता और दूरदृष्टि के सिध्दान्त को लागू किया गया है।
 
 यह बात तय है कि नेता बनने के इच्छुक छात्रों में अनेक ऐसे होंगे जिनकी जेबें खाली होगी। ऐसे लोगों के लिए एक कानूनी अनुबन्ध का प्रावधान होगा। इस प्रावधान के अनुसार छात्र की फीस 'एजूकेशन लोन' के रूप में दी जाएगी। छात्र इस लोन को नेता बनने के बाद चुकाएगा। नेतागिरी चमकने के बाद ऐसी रकम वे अपने विद्यामन्दिर को देंगे जिसका मूल्य लोन की रकम से दोगुना या तीन गुना होगा।

स्कूल के प्राचार्य कक्ष में लगी खूबसूरत पट्टिका पर ऐसे उदारमना नेताओं का नाम प्रमुखता से लिखा जाएगा। भारतीय लोकतंत्र का एक उज्जवल पक्ष यह है कि चुनाव जीतने के बाद नेता का रूतबा ही नहीं बढ़ता, साल के 365 दिन खुद-ब-खुद सुधरने लगते हैं। ऐसे में अपने विद्यामंदिर को कर्ज की रकम चुकाने में कोई दिक्कत नहीं, खुशी होगी।
 

 फैकल्टी का टोटा हर अच्छे शि‍क्षण संस्थान में देखा जा रहा है। मेरे मित्र ने इस समस्या का समाधान बिजिटिंग फैकल्टी के माध्यम से करने की सोची है। लालू सरीखे नेताओं को इस फैकल्टी में शामिल किया जाएगा।