Monday, May 10, 2010
उपजाऊ जमीन के काँटे
अशोक बंसल
1840 में आस्टेªलिया की धरती ने सोना उलगना शुरू किया। हुकूमत करने वाले गोरे ‘अलीबाबा और चालीस चोर’ की स्टाइल में जगह-जगह ‘खुल जा सिमसिम’ कहते घूम रहे थे। दुनिया भर में, आस्टेªलिया में सोना निकलने की खबरें पहुँची। अनेक देशों के मजदूर हाथों में कुदाल और फावड़े ले आस्टेªलिया जा पहुँचे। कई स्थानों पर मौजूद पहाड़ों को खोद खोदकर मजदूर सोना निकालते। गोरी सरकार इसे खरीदकर और फिर जहाज में लादकर लन्दन पहुँचा देती। यह क्रम 1900 तक चला।
‘गोल्ड रश’ नाम से मशहूर इस दौड़ में चीनियों ने जबर्दस्त बाजी मारी। सन् 1850 में मेलबर्न से सौ कि0मी0 दूर बेलारंट की पहाड़ी से सोना खोदकर निकालने वालों में चीनियों की संख्या बीस हजार थी। अपने काम में माहिर और मेहनती चीनियों से गोरे लोग दूरी बनाकर ही नहीं रखते थे बल्कि ब्रिटिश सैनिकों की मदद से वे चीनियों के टेण्टों में घुसकर लूटपाट और मारपीट भी करते थे। चीनी डरे नहीं, डटे रहे।
आस्टेªलिया में आज चीनी लोगों का अपना एक अलग संसार है। आर्थिक जगत में चमकते चीनी हर पर्यटक को चहकते-दमकते दिखाई देते हैं। राजनीति में भी वे बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। 150 वर्ष पूर्व गोरों द्वारा चीनी समुदाय पर किए गए हमले अब इतिहास की विषयवस्तु है।
दो वर्ष पूर्व मैं मेलवर्न की सड़कों पर चौकड़ी भरते हुए आस्ट्रेलिया के इतिहास को जानने के लिए संग्रहालय दर संग्रहालय भटकता रहता था। यहीं मैंने जाना कि इस अद्भुत धरती के मूल निवासियों (एब्रोजनीज) को अंग्रेजो ने चुन-चुन कर कैसे मारा और उनकी लाखों की संख्या हजारो में कर दी।
आज मेलबर्न की इन्ही सड़कों पर भारतीयों पर होने वाले हमले, लूटपाट और हत्या ने मुझे जबर्दस्त धक्का पहुँचाया है। आस्टेªलिया की सरकार ने संग्राहलयों में गोरों द्वारा मूल निवासियों पर किए गए भीषण अत्याचारों को बड़ी ईमानदारी से दर्शाया है। इस ईमानदारी को देख मैं आस्ट्रेलिया की सरकार के प्रति श्रद्धानत था लेकिन आज भारतीय छात्रों पर होने वाले गोरे नौजवानों के नस्ली हमलों को ‘लूटपाट की साधारण घटना’ कहकर मामले की गंभीरता को कम करके आंकना आस्टेªलियाई मंत्रियों के लिए कितना उचित है?
63 साल की आजादी में हमारे देश के राजनैतिक कुप्रबन्धन ने नौजवानों को भटकाव के रास्ते पर ला पटका है। सिर्फ 20 फीसदी लोगों के लिए ‘देश सोने की चिड़िया’ है, बाकी के लिए जीने के लिए जुगाड़ करना ही जीवन है। ऐसे में नौजवानों में पलायन की प्रवृत्ति बढ़ी है।
अन्य देशों के मुकाबले आस्ट्रेलिया बसने के लिए उपयुक्त जगह है। खान-पान, रहन-सहन, वेतन आदि सब कुछ बढ़िया। 27 लाख आबादी वाले अकेले मेलबर्न में 70 हजार भारतीय हैं। आस्ट्रेलियाई सरकार को मानव संसाधन की बहुत जरूरत है। अतः मेलबर्न की आबादी 2030 तक 50 लाख करने का लक्ष्य रखा है। पर्थ, कैनबरा, एडिलेट, सिडनी, मेलबर्न कहीं भी बसो, स्थायी निवासी बनने पर जमीन खरीदों तो रियायत, बच्चे पैदा करने पर भी पुरूस्कार।
मैंने मेलबर्न में भारतीय लोगों को ‘बल्ले-बल्ले’ करते देखा। ‘क्या से क्या हो गए’ गाते देखा। कुल मिलाकर स्थायी वीजा लेकर आस्टेªलिया में बसने वाले भारतीय संपन्नता की मंजिल तय कर रहे हैं, साथ ही पराए देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं। अपनों से हजारों मील दूर रहकर आस्टेªलिया के विकास में सहयोग करने वाले भारतीयों पर होने वाले लगातार हमलों को आस्टेªलिया की सरकार फिर गंभीरता से क्यों नहीं ले रही, यह सवाल मेरे मानस को उद्वेलित करता है। एक भारतीय कर्टूनिस्ट ने अपने एक कार्टून में विक्टोरिया पुलिस को नस्लवादी संगठन ‘कू क्लाक्स क्लान’ का सदस्य दर्शाकर पुलिस के निकम्मेपन को रेखांकित करने की कोशिश की तो आस्ट्रेलिया की सरकार ने भारतीय मीड़िया को संयम बरतने का पाठ पढ़ा दिया। जब हम एक दूसरे के पूरक हैं तो सच को स्वीकार करने में देरी क्यो?
आस्टेªलिया के दो-दो माह के दो प्रवास में मैंने अनुभव किया है कि रोटी रोजी की जुगाड़ में गए भारतीयों के पैर आस्टेªेलिया की धरती पर अब अंगद के पैर बन चुके हैं। ऐसे में बेगुनाह छात्रों पर गोरों के हमलों से दहशत पैदा करने की कोशिश नाकाम सिद्ध होगी, बिलकुल वैसे जैसे 150 वर्ष पूर्व सोने की तलाश में आए चीनियों पर किए गए सुनियोजित हमलों के बाद चीनी भागे नहीं बल्कि ज्यादा मजबूत होकर वहीं बस गए।
प्रेषक: डॉ. अशोक बंसल 17, बल्देवपुरी एक्सटेंशन, मथुरा-281004, मो0 09837319969
लाल ताजमहल
यदि आपसे कहा जाए कि ताजनगरी आगरा में एक ताजमहल और है,यह दूधिया संगमरमर के बजाय लाल पत्थराूें से बना है तो आप चौंकेंगे अवश्य । आप ही नहीं आगरा के वाशिन्दे भी इसे ‘मूर्खतापूर्ण वक्तव्य’ कहने से नहीं चूकेंगे, लेकिन सच्चाई यह है कि आगरा में एक लाल ताजमहल भी है, पुरातत्व विभाग के कब्जे में होने के बावजूद एकदम अप्रचारित और उपेक्षित।
आगरा स्थित ‘भगवान टॉकीज’ के पास विशाल परकोटे में सिमटा कब्रिस्तान उत्तरी भारत का सबसे पुराना रोमन कैथेलिक कब्रिस्तान कहा जाता है। निश्चय ही, आगरा की अन्य इमारतों की तरह यह एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह बात अलग है कि पुरातत्व विभाग की उपेक्षा और अदूरदर्शिता के कारण लाखों की संख्या में आगरा आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों की नजर से एकदम अछूता है।
सैकड़ों छोटी-बड़ी, टूटी-फूटी, उजाड़ और कई भव्य और आकर्षक कब्रों की रखवाली के बूढा माली सिताब खॉ तैनात है। कब्रिस्तान के मुख्य द्वार पर बैठे सिताब खॉ का दिन बोरियत भरा बीतता है। इसका कारण है कि यहॉ आने वाले पर्यटकों की संख्या न के बराबर है। पुरातत्व विभाग के अफसर भी यहॉ यदा-कदा आते हैं, मानो इस कब्रिस्तान में भूतों का डेरा हो।
कब्रिस्तान के ठीक बीच में थित है लाल ताजमहल । शाहजहॉ के ताजमहल के मुकाबले भव्य तो नहीं पर लाल पत्थरों के इस ताजमहल को देखने पर कतई महसूस नहीं होता कि जिस प्रेमी ने इसेे प्रेमिका की याद में खड़ा किया है, उसका प्यार बादशाह शाहजहॉ और मुमताज के प्यार से किसी मायने में कम न था। चौकीदार सिताब खॉ को इस कब्रिस्तान में रहते-रहते कब्रों में दफन लोगों से लगाव पैदा हो गया था । वह यहॉ आने वाले पर्यटकों को कमरों के बीचों-बीच बनी खूबसूरत कब्र पर खुदी इबारत को पढ़ने का न्यौता अवश्य देता था ।
‘‘जॉन विलियम हैसिंग की मृत्यु 21 जुलाई 1803 को हुई। उन्होंने 60 साल 11 माह 5 दिन की जिन्दगी पाई। हैंसिग 1762 में भारत आए और दक्षिण निजाम सेवा में रहे। 1784 में तत्कालीन महाराज माधवराव सिंधिया की सेवा में रहे। कई युद्धों में हिस्सा लिया। 1787 में आगरा के पास भौंदा गॉंव में बहादुरी से लड़े और नबाब इस्माइल के विरुद्ध हुए युद्ध में बुरी तरह घायल हुए। 1793 में माधवराय सिंधिया की मृत्यु के बाद दौतराव की सेवा में रहे। 1798 में हैंसिग ने कर्नल का पद संभाला और अन्तिम श्वॉस तक आगरा किला और आगरा शहर की कमांड संभाले रखी।’’
काले चमकीले पत्थर पर इबारत खोदने वाले फिलिप हंट, कलकत्ता का नाम है। कहते हैं कि हैसिंग की पत्नी एलिस ने इस ताजमहल को एक लाख रुपया खर्च कर बनवाया था। सिताब खॉ कमरे में मौजूद नीरवता को तोड़ते कहते थे- ‘‘साहब ! यह तो नकली कब्र है, असली तो नीचे है।’’ सीढ़ियॉ उतरते हुए हम तहखानेनुमा कमरे में पहुॅचे। चारों ओर गन्दगी और अन्धकार का साम्राज्य था। बदबू और चमकादड़ की डरावनी आवाज के आगे असली कब्र के सामने ज्यादा ठहरने की हिम्मत नहीं हुईं। असली कब्र पर भी कुछ खुदा था लेकिन पुरातत्व विभाग की ‘मेहरबानी’ इतिहास के पन्नों को गहराई से पढ़ने की इजाजत नहीं देती।
अपने सिरों पर झड़ी गन्दगी को पोंछते हुए गहरे निःश्वास को छोड़ते हुए हम बाहर आए। लाल ताजमहल के पास खड़े दूसरी कब्रों के बीच दबे ढके इतिहास के पन्नों को पढ़ने की इच्छा हुई। साथी कैलाश वर्मा ने सिताब खॉ से पूछा- ‘इस कब्रिस्तान की सबसे पुरानी कब्र कौन सी है?’ सिताब खॉ चौकीदार था पुरातत्व विभाग का लेकिन हमारा तो गाइड था। हमारा ही नहीं, भूले-भटके आ टपकने वाले हर जिज्ञासु का।
17वीं-18वीं शताब्दी में यह कब्रिस्तान ईसाईयों का तीर्थ माना जाता था। उस जमाने में साधन-संपन्न अंग्रेज यदि दूरदराज इलाकों में प्राण छोड़ते थे, तो उनके रिश्तेदार और मित्र मृतक के शरीर को सैंकड़ो मील लाकर आगरा के इसी कब्रिस्तान में दफनाने में सुख और संतोष का अनुभव करते थे। तभी तो मिल्डन हॉल मरे अजमेर में और आराम फरमा रहे हैं आगरा के ऐतिहासिक कब्रिस्तान में।
मिल्डन हॉल की कब्र इस कब्रिस्तान की सबसे पुरानी कब्र मानी जाती है। कब्र पर लगे पत्थर पर खुदा है-‘जॉन मिल्डन हॉल लन्दन से चलकर 1599 में पर्शिया होते हुए हिन्दुस्तान आए। 1605 में लाहौर में बीमार पड़े और अजमेर में दम तोड़ा। वहॉ उनके दोस्त केरिज मर्चेन्ट ने उन्हें आगरा लाकर दफना दिया।’ कहते हैं मिल्डन हॉल एक यात्री की हैसियत से हिन्दुस्तान घुमा लेकिन अफसोस यह है कि उसकी रोमांचकारी यात्राओं का कोई विवरण उपलब्घ नहीं। मिल्डन हॉल ने बादशाह अकबर को अपना परिचय रानी एलिजाबेथ के प्रतिनिधि के रुप में दिया था।
लाल ताजमहल के र्दाइं तरफ पीछे की ओर पिरामिड की शक्ल में बनी कब्र इतिहास का एक और पृष्ठ खोलती है। यह जनरल पैरौ के चौथे बेटे, जिसकी मृत्यु 1793 में हुई, की कब्र है। जनरल पैरो महाराजा सिंधिया की फौज के महत्वपूर्ण कंमाडर थे। सिािताब खॉ ने बताया कि जनरल पैरो के वंशज दो साल पहले इंग्लैण्ड से यहॉ आए थे। कब्र पर जमीं काई को देखकर उन्होंने ऑसू बहाए थे। अपने पूर्वजों की निशानी को सही-सलामत बने रहने की इच्छा प्रकट की। इसके लिए अच्छी-खासी रकम भी दे गए थे, लेकिन कब्र पर जमीं मोटी परत किसी ने हटाई।
ताज का निर्माण 1631 से 1653 माना गया है। यानि कि इन बाईस वर्षों में अनेक कलाशिल्पियों और मजदूरों ने शाहजहॉ के सपनों को साकार किया था। इन्हीं शिल्पियों में एक था जरोमी बरोनियो। कहते हैं जरोमी की कब्र भी आगरा के इसी कब्रिस्तान में मौजूद है। सन् 1945 में आगरा के फादर सुपारियर रेगलर ने एक कब्र से कुछ काई हटाई तो एक पत्थर पर ‘जरोमी बरोनियो’ खुदा मिला।
लेखक ने अपने साथी डा0 मनोरंजन शर्मा के साथ कब्रों पर खुदी इबारत के बीच अमर शिल्पी का नाम खोजने की भरसक कोशिश की लेकिन न जाने कहॉ गुम हो गया जरोमी बरानियो। बात यह भी ठाक है कि ‘नींव के पत्थरों’ को गुमनामी के अॅंधेरे में विलीन होने में ही आनन्द आता है।
पुरातत्व विभाग का यह दायित्व है कि संगमरमरी ताजमहल के अमर शिल्पी जरोमी बरोनियो की कब्र की पहचान तय करे ताकि मनमोहक ताजमहल पर लट्टू होने वाले देशी-विदेशी पर्यटक जरोमी बरोनियो को भी अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित कर सकें।
आगरा स्थित ‘भगवान टॉकीज’ के पास विशाल परकोटे में सिमटा कब्रिस्तान उत्तरी भारत का सबसे पुराना रोमन कैथेलिक कब्रिस्तान कहा जाता है। निश्चय ही, आगरा की अन्य इमारतों की तरह यह एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह बात अलग है कि पुरातत्व विभाग की उपेक्षा और अदूरदर्शिता के कारण लाखों की संख्या में आगरा आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों की नजर से एकदम अछूता है।
सैकड़ों छोटी-बड़ी, टूटी-फूटी, उजाड़ और कई भव्य और आकर्षक कब्रों की रखवाली के बूढा माली सिताब खॉ तैनात है। कब्रिस्तान के मुख्य द्वार पर बैठे सिताब खॉ का दिन बोरियत भरा बीतता है। इसका कारण है कि यहॉ आने वाले पर्यटकों की संख्या न के बराबर है। पुरातत्व विभाग के अफसर भी यहॉ यदा-कदा आते हैं, मानो इस कब्रिस्तान में भूतों का डेरा हो।
कब्रिस्तान के ठीक बीच में थित है लाल ताजमहल । शाहजहॉ के ताजमहल के मुकाबले भव्य तो नहीं पर लाल पत्थरों के इस ताजमहल को देखने पर कतई महसूस नहीं होता कि जिस प्रेमी ने इसेे प्रेमिका की याद में खड़ा किया है, उसका प्यार बादशाह शाहजहॉ और मुमताज के प्यार से किसी मायने में कम न था। चौकीदार सिताब खॉ को इस कब्रिस्तान में रहते-रहते कब्रों में दफन लोगों से लगाव पैदा हो गया था । वह यहॉ आने वाले पर्यटकों को कमरों के बीचों-बीच बनी खूबसूरत कब्र पर खुदी इबारत को पढ़ने का न्यौता अवश्य देता था ।
‘‘जॉन विलियम हैसिंग की मृत्यु 21 जुलाई 1803 को हुई। उन्होंने 60 साल 11 माह 5 दिन की जिन्दगी पाई। हैंसिग 1762 में भारत आए और दक्षिण निजाम सेवा में रहे। 1784 में तत्कालीन महाराज माधवराव सिंधिया की सेवा में रहे। कई युद्धों में हिस्सा लिया। 1787 में आगरा के पास भौंदा गॉंव में बहादुरी से लड़े और नबाब इस्माइल के विरुद्ध हुए युद्ध में बुरी तरह घायल हुए। 1793 में माधवराय सिंधिया की मृत्यु के बाद दौतराव की सेवा में रहे। 1798 में हैंसिग ने कर्नल का पद संभाला और अन्तिम श्वॉस तक आगरा किला और आगरा शहर की कमांड संभाले रखी।’’
काले चमकीले पत्थर पर इबारत खोदने वाले फिलिप हंट, कलकत्ता का नाम है। कहते हैं कि हैसिंग की पत्नी एलिस ने इस ताजमहल को एक लाख रुपया खर्च कर बनवाया था। सिताब खॉ कमरे में मौजूद नीरवता को तोड़ते कहते थे- ‘‘साहब ! यह तो नकली कब्र है, असली तो नीचे है।’’ सीढ़ियॉ उतरते हुए हम तहखानेनुमा कमरे में पहुॅचे। चारों ओर गन्दगी और अन्धकार का साम्राज्य था। बदबू और चमकादड़ की डरावनी आवाज के आगे असली कब्र के सामने ज्यादा ठहरने की हिम्मत नहीं हुईं। असली कब्र पर भी कुछ खुदा था लेकिन पुरातत्व विभाग की ‘मेहरबानी’ इतिहास के पन्नों को गहराई से पढ़ने की इजाजत नहीं देती।
अपने सिरों पर झड़ी गन्दगी को पोंछते हुए गहरे निःश्वास को छोड़ते हुए हम बाहर आए। लाल ताजमहल के पास खड़े दूसरी कब्रों के बीच दबे ढके इतिहास के पन्नों को पढ़ने की इच्छा हुई। साथी कैलाश वर्मा ने सिताब खॉ से पूछा- ‘इस कब्रिस्तान की सबसे पुरानी कब्र कौन सी है?’ सिताब खॉ चौकीदार था पुरातत्व विभाग का लेकिन हमारा तो गाइड था। हमारा ही नहीं, भूले-भटके आ टपकने वाले हर जिज्ञासु का।
17वीं-18वीं शताब्दी में यह कब्रिस्तान ईसाईयों का तीर्थ माना जाता था। उस जमाने में साधन-संपन्न अंग्रेज यदि दूरदराज इलाकों में प्राण छोड़ते थे, तो उनके रिश्तेदार और मित्र मृतक के शरीर को सैंकड़ो मील लाकर आगरा के इसी कब्रिस्तान में दफनाने में सुख और संतोष का अनुभव करते थे। तभी तो मिल्डन हॉल मरे अजमेर में और आराम फरमा रहे हैं आगरा के ऐतिहासिक कब्रिस्तान में।
मिल्डन हॉल की कब्र इस कब्रिस्तान की सबसे पुरानी कब्र मानी जाती है। कब्र पर लगे पत्थर पर खुदा है-‘जॉन मिल्डन हॉल लन्दन से चलकर 1599 में पर्शिया होते हुए हिन्दुस्तान आए। 1605 में लाहौर में बीमार पड़े और अजमेर में दम तोड़ा। वहॉ उनके दोस्त केरिज मर्चेन्ट ने उन्हें आगरा लाकर दफना दिया।’ कहते हैं मिल्डन हॉल एक यात्री की हैसियत से हिन्दुस्तान घुमा लेकिन अफसोस यह है कि उसकी रोमांचकारी यात्राओं का कोई विवरण उपलब्घ नहीं। मिल्डन हॉल ने बादशाह अकबर को अपना परिचय रानी एलिजाबेथ के प्रतिनिधि के रुप में दिया था।
लाल ताजमहल के र्दाइं तरफ पीछे की ओर पिरामिड की शक्ल में बनी कब्र इतिहास का एक और पृष्ठ खोलती है। यह जनरल पैरौ के चौथे बेटे, जिसकी मृत्यु 1793 में हुई, की कब्र है। जनरल पैरो महाराजा सिंधिया की फौज के महत्वपूर्ण कंमाडर थे। सिािताब खॉ ने बताया कि जनरल पैरो के वंशज दो साल पहले इंग्लैण्ड से यहॉ आए थे। कब्र पर जमीं काई को देखकर उन्होंने ऑसू बहाए थे। अपने पूर्वजों की निशानी को सही-सलामत बने रहने की इच्छा प्रकट की। इसके लिए अच्छी-खासी रकम भी दे गए थे, लेकिन कब्र पर जमीं मोटी परत किसी ने हटाई।
ताज का निर्माण 1631 से 1653 माना गया है। यानि कि इन बाईस वर्षों में अनेक कलाशिल्पियों और मजदूरों ने शाहजहॉ के सपनों को साकार किया था। इन्हीं शिल्पियों में एक था जरोमी बरोनियो। कहते हैं जरोमी की कब्र भी आगरा के इसी कब्रिस्तान में मौजूद है। सन् 1945 में आगरा के फादर सुपारियर रेगलर ने एक कब्र से कुछ काई हटाई तो एक पत्थर पर ‘जरोमी बरोनियो’ खुदा मिला।
लेखक ने अपने साथी डा0 मनोरंजन शर्मा के साथ कब्रों पर खुदी इबारत के बीच अमर शिल्पी का नाम खोजने की भरसक कोशिश की लेकिन न जाने कहॉ गुम हो गया जरोमी बरानियो। बात यह भी ठाक है कि ‘नींव के पत्थरों’ को गुमनामी के अॅंधेरे में विलीन होने में ही आनन्द आता है।
पुरातत्व विभाग का यह दायित्व है कि संगमरमरी ताजमहल के अमर शिल्पी जरोमी बरोनियो की कब्र की पहचान तय करे ताकि मनमोहक ताजमहल पर लट्टू होने वाले देशी-विदेशी पर्यटक जरोमी बरोनियो को भी अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित कर सकें।
Sunday, March 28, 2010
अभिनन्दन बनाम श्राध्द
चचा सुखराम के दिमाग में एक गजब का विचार कौंधा है। वह अपना अभिनन्दन ग्रन्थ खुद ही तैयार करने में जुट गए हैं। ग्रन्थ की मोटी-मोटी बातें उन्होंने चाची के साथ बथुआ का परांठा खाते-खाते तैयार कर ली हैं। ग्रन्थ 'कलरफुल' होगा, बढ़िया कागज और पृष्ठों की संख्या भी भरपेट। तीन खण्डों में बटे 'सुखराम अभिनन्दन ग्रन्थ' में कृतित्व और ‘श्हर के इतिहास का विस्तृत रोजनामचा होगा।
चचा पैंसठ के लपेटे में हैं। जिन्दगी के लम्बे सफर में चचा का सामाजिक योगदान और बहुआयामी व्यक्तित्व किसी से कम नहीं है।
खबरची पुराने हैं वे। मुहल्ले में चाकू चला नहीं अखबार वालों को खबर देने में चचा ने कभी देर नहीं की। धीरे-धीरे अखबार वालों के खास बनते ही चचा मौखिक सूचना देने के स्थान पर खुद ही लिखने लगे और पत्रकारिता के पायदान पर पैर जमा दिए। शहर की सभा, सोसाइटी, कवि गोष्ठी में अग्रपंक्ति में चचा सदैव बैठते रहे हैं।
26 जनवरी की बात है। बच्चों के स्कूल में मुख्य अतिथि नहीं आए। आकाश में बंधा तिरंगा फहराने को मचल रहा था। धोती कुर्ता जाकेट में अग्रपंक्ति में डटे थे सुखराम।
प्रिंसीपल को इससे बढ़िया दूसरा स्वतंत्रता सैनानी दिखाई नहीं दिया। माइक पर नाम पुकारते ही चचा उठे और झंडे की डोरी खींच दी। सलामी देने में चचा को असीम आनन्द की अनुभूति हुई।
चचा की कल्पना की गति जेट विमान से तेज है। झंडे की डोरी खींचते ही चचा स्वतंत्रता सैनानी बन गए। उन्हें नहीं मालूम है कि उनकी तीन पीढ़ियों में कोई जेल गया हो या किसी ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ नारेबाजी की हो। लेकिन कल्पना के रथ बैठे वे सन् 42 के 'भारत छोड़ो आन्दोलन' में शरीक हो गए। थाने का घिराव किया। पुलिस ने डण्डे बरसाए। चचा के दाऐं टखने पर चोट का निशान है। चचा को याद है कि यह निशन बचपन में साइकिल से गिरने का है। चचा को अब यह निशान सन् 1942 का बताना पड़ रहा है। स्वतंत्रता सैनानी जो हैं। चचा ने योजना बना ली है कि अभिनन्दन ग्रन्थ के व्यक्तित्व वाले खण्ड में यह सूचनाऐं पाठकों का ज्ञानवर्ध्दन करेंगी।
चचा टेंशन में हैं आजकल। हमने दबी जुबान से पूछा 'चचा! आप 'सुखराम अभिनन्दन ग्रन्थ' की तैयारी कैसे कर रहे हैं ?' चचा बोले 'भतीजे ! तुझसे कुछ नहीं छुपांऊंॅगा। कुछ लेख तो खुद ही लिख लिए हैं। कुछ मित्रों से लिखवा रहा हॅू। लोगों को मेरे बारे में याद नहीं रहा सो विस्तृत बायोडाटा छपवा लिया है। एक लेख तुमको लिखना है। तुम मेरे सामाजिक व मानवीय गुणों को रेखांकित करो। जैसे-सड़क पर पड़े केले के छिलकों को फेंकने और किसी अन्धे की बांह पकड़ सड़क पार कराने की मेरी पुरानी आदत। मेरे विनम्र स्वर और गांधी भक्त होने को हाईलाइट करो। मेरे संपर्कों में गांधी, नेहरू को छोड़कर दूसरे नेताओं से मेरे रिस्तों का हवाला दे सकते हो। तुम लिख दो .......... मैं एडिट कर लूॅगा।'
चचा ने बकायदा 'अभिनन्दन ग्रन्थ समिति' बनाई है। लेटर हैड छपवाए हैं। चचा चन्दा करने में माहिर हैं। सो उगाही भी चल रही है। चचा के कदमों में गजब की तेजी है।
कुंऐ में पैर लटकाए बैठे चचा सुखराम और अभिनन्दन ग्रन्थ प्रकाशित करने के विराट सपने के लिए की जाने वाली उनकी अटूट मेहनत को देख मैं हैरत में हॅू। अचानक पूछ बैठा, 'इतना श्रम क्यों - किसलिए ?' चचा गहरी निश्वा स छोड़ते दयनीय स्वरों में बोले, 'पिछले दिनों सुनामी और फिर कशमीर में हुई बर्फबारी ने कलेजे में धुक-धुक कर दी है। यकीन होने लगा है कि पृथ्वी पर बिगड़ते संतुलन से गुस्साई प्रकृति काली माँ बन गई है। क्या मालूम कल कौन सा घर दब जाए, किसकी इहलीला समाप्त हो जाए। ऐसे में बेहतर है अपना श्राध्द खुद कर जाओ। भतीजे ! अभिनन्दन ग्रन्थ की योजना इसी श्राध्द की एक कड़ी है।' मैं निषब्दं चचा को टुकुर-टुकुर निहार रहा हूँ।
***
चचा सुखराम के दिमाग में एक गजब का विचार कौंधा है। वह अपना अभिनन्दन ग्रन्थ खुद ही तैयार करने में जुट गए हैं। ग्रन्थ की मोटी-मोटी बातें उन्होंने चाची के साथ बथुआ का परांठा खाते-खाते तैयार कर ली हैं। ग्रन्थ 'कलरफुल' होगा, बढ़िया कागज और पृष्ठों की संख्या भी भरपेट। तीन खण्डों में बटे 'सुखराम अभिनन्दन ग्रन्थ' में कृतित्व और ‘श्हर के इतिहास का विस्तृत रोजनामचा होगा।
चचा पैंसठ के लपेटे में हैं। जिन्दगी के लम्बे सफर में चचा का सामाजिक योगदान और बहुआयामी व्यक्तित्व किसी से कम नहीं है।
खबरची पुराने हैं वे। मुहल्ले में चाकू चला नहीं अखबार वालों को खबर देने में चचा ने कभी देर नहीं की। धीरे-धीरे अखबार वालों के खास बनते ही चचा मौखिक सूचना देने के स्थान पर खुद ही लिखने लगे और पत्रकारिता के पायदान पर पैर जमा दिए। शहर की सभा, सोसाइटी, कवि गोष्ठी में अग्रपंक्ति में चचा सदैव बैठते रहे हैं।
26 जनवरी की बात है। बच्चों के स्कूल में मुख्य अतिथि नहीं आए। आकाश में बंधा तिरंगा फहराने को मचल रहा था। धोती कुर्ता जाकेट में अग्रपंक्ति में डटे थे सुखराम।
प्रिंसीपल को इससे बढ़िया दूसरा स्वतंत्रता सैनानी दिखाई नहीं दिया। माइक पर नाम पुकारते ही चचा उठे और झंडे की डोरी खींच दी। सलामी देने में चचा को असीम आनन्द की अनुभूति हुई।
चचा की कल्पना की गति जेट विमान से तेज है। झंडे की डोरी खींचते ही चचा स्वतंत्रता सैनानी बन गए। उन्हें नहीं मालूम है कि उनकी तीन पीढ़ियों में कोई जेल गया हो या किसी ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ नारेबाजी की हो। लेकिन कल्पना के रथ बैठे वे सन् 42 के 'भारत छोड़ो आन्दोलन' में शरीक हो गए। थाने का घिराव किया। पुलिस ने डण्डे बरसाए। चचा के दाऐं टखने पर चोट का निशान है। चचा को याद है कि यह निशन बचपन में साइकिल से गिरने का है। चचा को अब यह निशान सन् 1942 का बताना पड़ रहा है। स्वतंत्रता सैनानी जो हैं। चचा ने योजना बना ली है कि अभिनन्दन ग्रन्थ के व्यक्तित्व वाले खण्ड में यह सूचनाऐं पाठकों का ज्ञानवर्ध्दन करेंगी।
चचा टेंशन में हैं आजकल। हमने दबी जुबान से पूछा 'चचा! आप 'सुखराम अभिनन्दन ग्रन्थ' की तैयारी कैसे कर रहे हैं ?' चचा बोले 'भतीजे ! तुझसे कुछ नहीं छुपांऊंॅगा। कुछ लेख तो खुद ही लिख लिए हैं। कुछ मित्रों से लिखवा रहा हॅू। लोगों को मेरे बारे में याद नहीं रहा सो विस्तृत बायोडाटा छपवा लिया है। एक लेख तुमको लिखना है। तुम मेरे सामाजिक व मानवीय गुणों को रेखांकित करो। जैसे-सड़क पर पड़े केले के छिलकों को फेंकने और किसी अन्धे की बांह पकड़ सड़क पार कराने की मेरी पुरानी आदत। मेरे विनम्र स्वर और गांधी भक्त होने को हाईलाइट करो। मेरे संपर्कों में गांधी, नेहरू को छोड़कर दूसरे नेताओं से मेरे रिस्तों का हवाला दे सकते हो। तुम लिख दो .......... मैं एडिट कर लूॅगा।'
चचा ने बकायदा 'अभिनन्दन ग्रन्थ समिति' बनाई है। लेटर हैड छपवाए हैं। चचा चन्दा करने में माहिर हैं। सो उगाही भी चल रही है। चचा के कदमों में गजब की तेजी है।
कुंऐ में पैर लटकाए बैठे चचा सुखराम और अभिनन्दन ग्रन्थ प्रकाशित करने के विराट सपने के लिए की जाने वाली उनकी अटूट मेहनत को देख मैं हैरत में हॅू। अचानक पूछ बैठा, 'इतना श्रम क्यों - किसलिए ?' चचा गहरी निश्वा स छोड़ते दयनीय स्वरों में बोले, 'पिछले दिनों सुनामी और फिर कशमीर में हुई बर्फबारी ने कलेजे में धुक-धुक कर दी है। यकीन होने लगा है कि पृथ्वी पर बिगड़ते संतुलन से गुस्साई प्रकृति काली माँ बन गई है। क्या मालूम कल कौन सा घर दब जाए, किसकी इहलीला समाप्त हो जाए। ऐसे में बेहतर है अपना श्राध्द खुद कर जाओ। भतीजे ! अभिनन्दन ग्रन्थ की योजना इसी श्राध्द की एक कड़ी है।' मैं निषब्दं चचा को टुकुर-टुकुर निहार रहा हूँ।
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Friday, March 19, 2010
एक विधायक की आत्मकथा
यह दुनिया बडी निर्मम है। इतनी बड़ी दुर्घटना हो गई और किसी ने 'उफ्' तक नहीं की। देश् के किसी कोने से एक भी संवेदना संदेष भेजे जाने का कोई समाचार मीडिया वालों ने इतनी खबर दी कि राज्यपाल लोटा सिंह ने लुढ़का दी। घटना विहार में घटी लेकिन वैचारिक लुढ़का-पुढ़की यू.पी. के विधायक रामलाल के मन में हो रही है।
सब तरफ भाई-भाई का नारा लग रहा है। हिन्दी-चीनी भाई-भाई, अफसर-अफसर भाई-भाई। व्यापारी एकता जिन्दाबाद। षिक्षक अपनी मागें मनवाने के लिए एक दूसरे का हाथ थामे खड़े रहते हैं फिर विधायक-विधायक भाई-भाई क्यों नहीं हो सकते हैं। वे चाहे किसी प्रान्त के हों या किसी दल की टिकट पर जीते हों। कहलाते तो विधायक ही हैं। वेतन, भत्ता, सुविधा, खाने कमाने के अवसर तो एक जैसे हैं। टनाटन सफेदी जैसी एक
जीवन षैली है, एक सोच है, एक मकसद है और वह है 'स्व-सेवा'। राष्ट्र ही विधायक है, विधायक ही राष्ट्र है। बेचारे षपथ भी न ले पाए थे कि लुढ़का दी। चुनाव के तत्काल बाद विधानसभा भंग हो जाती तो भी ठीक था। हरी झण्डी दिखाने में दिल्ली ने राज्यपाल को तीन माह लगा दिए। दो-तीन महीने में जो मीठे सपने देखे वह तो न देखते। विधायक रामलाल भावनाओं में बहे जा रहे हैं। उनका विचार मंथन जैसे-जैसे गंभीर होता है उनके सीने की बांई तरफ टीसें बढ़ती जा रही हैं।
बड़ी मुष्किल, थुक्का फजीहती और मारा-मारी के बाद टिकिट की जुगत लगाओ और फिर ऐरेगैरे, नथ्थू गैरों के सामने हाथ जोड़ वोटों की भीख मांगो। वोट पड़ने से पहले की रात सारे ऐब करो, तब जाकर चुनाव जीतो। गले में माला पड़ गईं, विजय पर्व मन गया। गहरी नींद से जगे तो मालूम पड़ा कि लोटा सिंह ने बड़ी निर्ममता से लुढ़का दी। भगवान ऐसा बुरा हाल किसी विधायक का न करे। विधायक बने भी और न भी।
कहावत है कि पका आम ही धरती पर गिरता है लेकिन बिहार में विधानसभा चुनावों में जीते प्रतिनिधि बिना भाव, वेवक्त और बिना पके ही धड़ाम से टपक पड़े। पहली बार विधायक रामलाल ने पके आम वाली कहावत को चरितार्थ नहीं चकनाचूर होते देखा।
धरती बिहार की हिली है लेकिन हिचकोले यू.पी के विधायक रामलाल को लगे हैं। संवेदनश्ील हैं बेचारे। दहशत सी पैदा हो गई है कलेजे में। सत्ता में हो या विरोध में, मुख्यमंत्री अच्छा करे या बुरा, सरकार 5 वर्ष चलनी चाहिए। अब पार्टियों में समझदारी विकसित हो रही है। सभी ने आपस में गुप्त समझौता कर लिया है। -'सरकार गिराने की धमकी देते रहो, गिराओ मत।'
विधायक रामलाल के मन में संभावित होनी अनहोनी का चित्र घूम ही रहा था कि बचपन के मित्र ने उनके कमरे में प्रवेश किया। दु:खी आत्मा रामलाल का लटका मुंह देख मित्र बोले, 'रामलाल जी ! किशन चंदर की पुस्तक 'एक गधे की आत्मकथा' आपने पढ़ी है क्या ! यदि नहीं पढ़ी तो पढ़ लो। इसी शैली में एक विधायक की आत्मकथा लिख डालो। हम मदद करेंगे आपकी। पुस्तक में ईमानदारी से विधायकों की किस्में, उनकी कार्यश्ैली, जीवनषैली, उनके अनुभव आदि का विवरण लिख देना। पुस्तक 'बैस्ट सेलर' बनेगी।
विधायक रामलाल को मित्र का सुझाव पसन्द आया। वह पुस्तक का मसौदा तैयार करने में जुट गए हैं। यदि बिहार की तरह राज्यपाल यू.पी. में भी लुढ़का दें तो कोई चिन्ता नहीं। एक लेखक के रूप में रामलाल की प्रतिष्ठा तो बनी रहेगी।
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यह दुनिया बडी निर्मम है। इतनी बड़ी दुर्घटना हो गई और किसी ने 'उफ्' तक नहीं की। देश् के किसी कोने से एक भी संवेदना संदेष भेजे जाने का कोई समाचार मीडिया वालों ने इतनी खबर दी कि राज्यपाल लोटा सिंह ने लुढ़का दी। घटना विहार में घटी लेकिन वैचारिक लुढ़का-पुढ़की यू.पी. के विधायक रामलाल के मन में हो रही है।
सब तरफ भाई-भाई का नारा लग रहा है। हिन्दी-चीनी भाई-भाई, अफसर-अफसर भाई-भाई। व्यापारी एकता जिन्दाबाद। षिक्षक अपनी मागें मनवाने के लिए एक दूसरे का हाथ थामे खड़े रहते हैं फिर विधायक-विधायक भाई-भाई क्यों नहीं हो सकते हैं। वे चाहे किसी प्रान्त के हों या किसी दल की टिकट पर जीते हों। कहलाते तो विधायक ही हैं। वेतन, भत्ता, सुविधा, खाने कमाने के अवसर तो एक जैसे हैं। टनाटन सफेदी जैसी एक
जीवन षैली है, एक सोच है, एक मकसद है और वह है 'स्व-सेवा'। राष्ट्र ही विधायक है, विधायक ही राष्ट्र है। बेचारे षपथ भी न ले पाए थे कि लुढ़का दी। चुनाव के तत्काल बाद विधानसभा भंग हो जाती तो भी ठीक था। हरी झण्डी दिखाने में दिल्ली ने राज्यपाल को तीन माह लगा दिए। दो-तीन महीने में जो मीठे सपने देखे वह तो न देखते। विधायक रामलाल भावनाओं में बहे जा रहे हैं। उनका विचार मंथन जैसे-जैसे गंभीर होता है उनके सीने की बांई तरफ टीसें बढ़ती जा रही हैं।
बड़ी मुष्किल, थुक्का फजीहती और मारा-मारी के बाद टिकिट की जुगत लगाओ और फिर ऐरेगैरे, नथ्थू गैरों के सामने हाथ जोड़ वोटों की भीख मांगो। वोट पड़ने से पहले की रात सारे ऐब करो, तब जाकर चुनाव जीतो। गले में माला पड़ गईं, विजय पर्व मन गया। गहरी नींद से जगे तो मालूम पड़ा कि लोटा सिंह ने बड़ी निर्ममता से लुढ़का दी। भगवान ऐसा बुरा हाल किसी विधायक का न करे। विधायक बने भी और न भी।
कहावत है कि पका आम ही धरती पर गिरता है लेकिन बिहार में विधानसभा चुनावों में जीते प्रतिनिधि बिना भाव, वेवक्त और बिना पके ही धड़ाम से टपक पड़े। पहली बार विधायक रामलाल ने पके आम वाली कहावत को चरितार्थ नहीं चकनाचूर होते देखा।
धरती बिहार की हिली है लेकिन हिचकोले यू.पी के विधायक रामलाल को लगे हैं। संवेदनश्ील हैं बेचारे। दहशत सी पैदा हो गई है कलेजे में। सत्ता में हो या विरोध में, मुख्यमंत्री अच्छा करे या बुरा, सरकार 5 वर्ष चलनी चाहिए। अब पार्टियों में समझदारी विकसित हो रही है। सभी ने आपस में गुप्त समझौता कर लिया है। -'सरकार गिराने की धमकी देते रहो, गिराओ मत।'
विधायक रामलाल के मन में संभावित होनी अनहोनी का चित्र घूम ही रहा था कि बचपन के मित्र ने उनके कमरे में प्रवेश किया। दु:खी आत्मा रामलाल का लटका मुंह देख मित्र बोले, 'रामलाल जी ! किशन चंदर की पुस्तक 'एक गधे की आत्मकथा' आपने पढ़ी है क्या ! यदि नहीं पढ़ी तो पढ़ लो। इसी शैली में एक विधायक की आत्मकथा लिख डालो। हम मदद करेंगे आपकी। पुस्तक में ईमानदारी से विधायकों की किस्में, उनकी कार्यश्ैली, जीवनषैली, उनके अनुभव आदि का विवरण लिख देना। पुस्तक 'बैस्ट सेलर' बनेगी।
विधायक रामलाल को मित्र का सुझाव पसन्द आया। वह पुस्तक का मसौदा तैयार करने में जुट गए हैं। यदि बिहार की तरह राज्यपाल यू.पी. में भी लुढ़का दें तो कोई चिन्ता नहीं। एक लेखक के रूप में रामलाल की प्रतिष्ठा तो बनी रहेगी।
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Thursday, March 18, 2010
बूढों की बैठक
देश के सीनियर सिटीजन का दर्द मुझे भी सालता है। सरकार एवं अनेक स्वयंसेवी संस्थाएे बूढ़ों की हिफाजत के लिए विचार गोष्ठियां आयोजित कर रही हैं। अनेक समाजसेवी बूढ़ों की सेवा के नाम पर गेस्ट हाउस खोलकर धनोपार्जन कर रहे हैं। ये समाजसेवी अपने गेस्ट हाउस को 'ओल्ड एज होम' का नाम दे गणतन्त्र दिवस पर पद्मश्री जैसे सम्मान पाने की जुगत में हैं।
पुराने जमाने के ऋिषियों-मुनियों ने इंसान की 100 वर्ष की उम्र मान इसे चार भागों में बांटकर जीने की कला का संदेश दिया था। हमारी सरकार ने इसे दो भागों में बांट दिया है। साठ से पहले और साठ के बाद। सरकारी नीतियों के षिकार बने इन बूढ़ों को अपना रिटायरमेन्ट दूध में गिरी मक्खी को निकाल देना जैसा लगता है। जवानी में ये बूढ़े सोचते थे कि साठ साल के होने पर शायद कोई स्पेशल कमजोरी आती होगी, तभी सरकार रिटायर करती है। लेकिन साठ साल के अन्दर बूढ़े अपने षरीर के अन्दर के रसायन पूर्ववत काम करते देखते हैं। उन्हें सरकार की इस नीति पर कभी क्रोध आता है तो कभी हैरत होती है। उन्हें लगता है कि उन्हें फिजूल में रिटायर कर दिया गया। बस इसी विचार के बाद बूढ़ों और जवानों में जबरदस्त खाई खुद जाती है।
पिछले दिनों मेरी गली के चार बूढ़ों ने अपात बैठक बुलाकर तय किया कि सरकार और नौजवानों से रोने-धोने, गिड़गिड़ाने आदि से न तो कोई सुविधा मिलेगी और न ही बाकी दिन कटेंगे। इस पहाड़ जैसी जिन्दगी को अपने तरीके से काटना होगा। चारों बूढ़े इस आइडिया पर एक मत हुए कि शाम के वक्त सभी एक साथ घर के आगे सड़क पर बैठेंगे। तीन-चार घण्टे मौज-मस्ती में गुजरेंगे। बीच-बीच में चाय-चुल्लड़ होगी। आदर्श,नैतिकता जैसे उबाऊ विषयों पर आपस में बातचीत नहीं होगी पर यदि कोई राहगीर भूले भटके अपने पास कुछ पल को ठहर जाऐ तो आदर्ष, नैतिकता, महाभारत, रामायण, वर्तमान समय में मूल्यों का अवमूल्यन आदि विषयों पर ही अपनी बातचीत केन्द्रित की जाऐगी। चारों बूढ़े बैठक में लिए फैसलों पर बेहद मगन है।
तिवारी जी चारों बूढ़ों में सीनियरमोस्ट हैं। उनके घर के बाहर लगे गुलमोहर के वृक्ष के पास शाम होते ही चारों बूढ़े आ धमकते हैं।
आज पहली बैठक थी। बैठक के सामने सड़क के दूसरी ओर रोजमर्रा के सामान की किराने की दुकान है। कालोनी वालों को इस दुकान से बहुत सुविधा है। महिलाऐं अपनी 'कम्फर्टेबिल ड्रेस' में हल्दी, नमक, धनियाँ, बिस्किट, ब्रेड आदि खरीदने आ जाती हैं। बूढ़ों को यह दृश्ये बहुत भाता है।
किसी महिला को सामान खरीदते देख बूढ़े अपना समान्य ज्ञान बढ़ाते रहते हैं। किसकी बहू है, किस शहर की है, कितने बच्चे हैं आदि की जानकारी आपस में बाट लेते हैं। त्यागी जी के बेटे की बहू है, चार साल षादी को हो गए पर बाल-गोपाल कोई नहीं जैसी आपसी जानकारी पर बूढ़े हैरत में पड़ जाते हैं। वे कोई ऊॅंच नीच होने की श्ंाका जाहिर करते हैं। एक बूढ़ा इस चर्चा को विराम देने की नीयत से कहता है कि 'पत्नी से पता करूॅंगा'। इसी तरह अनेक प्र' बैठक में अनुत्तरित रह जाते हैं। वे अगले दिन सुलझा लिए जाते हैं।
कभी-कभी ये बूढ़े सामान लेकर सामने से गुजरती महिला से घर-गृहस्थी से जुडे सवालों के बहाने बतिया भी लेते हैं। बेहद सम्मान और विनम्रता से पेश् आती ये महिला इन सीनियर सिटीजनों के रोम-रोम को कुछ क्षंण के लिए पुलकित कर देती हैं।
कहते हैं कि हमारी खुश्ी हमारे कामों को गति देती है। यही वजह है कि बूढ़ों की राह गुजरती महिलाओं से बतियाबन कर खीसें निपोरने की आदत पड़ गई है। बूढ़ों के दाँतों और घुटनों के दर्द मानो उडनछू हो गए हैं। कब्ज भी जाती रही है। लेकिन इन बूढ़ों को मोहल्ले की महिलाओं के कष्ट का तनिक भी अाभास नहीं। 'कम्फर्टेबिल ड्रेस' में किराने का सामान खरीदना इन महिलाओं के लिए अब दूभर हो गया है। ये महिलाऐं शाम को बूढ़ों की बैठक जमे, इससे पहले ही सौदा खरीदने या पड़ौसन से बतियाने जैसा काम निपटा लेती हैं। बैठक के वक्त महिलाओं ने सड़क पर चलना बन्द कर दिया है ा महिलाओं की अनुपस्थिति बूढ़ों को अन्दर ही अन्दर कचौट रही है। यह दर्द घुटनों के दर्द से बड़ा है पर कहें तो कैसे कहें और किससे कहें !
महिलाओं के नदारत होने पर बूढोंं ने राह गुजरते बच्चों से दोस्ती करने की सोची। उन्होंने खेलने जाते बच्चों से देश्-दुनिया के सामान्य ज्ञान के सवालों को पूछना श्ुरू किया। एक दिन तिवारी जी ने एक बालक से बडेृ दुलार से बात करनी चाही तो वह 'मम्मी बुला रही कहकर अदृश्यी हो गया।
इस बालक ने अपने दोस्तों को बूढ़ों की बैठक की खबर दे दी। नतीजा यह है कि बूढ़े अब सन्नाटे में बैठे हैं। गली का दुकानदार भी बूढ़ों को तिरछी नजर से देखने लगा है। उसकी दुकानदरी आधी रह गई है।
आजकल मेरी गली के सीनियर सिटीजनों को गठिया, दांत का दर्द और कब्ज ज्यादा सताने लगी है। ये बूढ़े अब बात कम कर, बाबा रामदेव की कपालभाती और अनुलोम-विलोम में ज्यादा रूचि ले रहे हैं।
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देश के सीनियर सिटीजन का दर्द मुझे भी सालता है। सरकार एवं अनेक स्वयंसेवी संस्थाएे बूढ़ों की हिफाजत के लिए विचार गोष्ठियां आयोजित कर रही हैं। अनेक समाजसेवी बूढ़ों की सेवा के नाम पर गेस्ट हाउस खोलकर धनोपार्जन कर रहे हैं। ये समाजसेवी अपने गेस्ट हाउस को 'ओल्ड एज होम' का नाम दे गणतन्त्र दिवस पर पद्मश्री जैसे सम्मान पाने की जुगत में हैं।
पुराने जमाने के ऋिषियों-मुनियों ने इंसान की 100 वर्ष की उम्र मान इसे चार भागों में बांटकर जीने की कला का संदेश दिया था। हमारी सरकार ने इसे दो भागों में बांट दिया है। साठ से पहले और साठ के बाद। सरकारी नीतियों के षिकार बने इन बूढ़ों को अपना रिटायरमेन्ट दूध में गिरी मक्खी को निकाल देना जैसा लगता है। जवानी में ये बूढ़े सोचते थे कि साठ साल के होने पर शायद कोई स्पेशल कमजोरी आती होगी, तभी सरकार रिटायर करती है। लेकिन साठ साल के अन्दर बूढ़े अपने षरीर के अन्दर के रसायन पूर्ववत काम करते देखते हैं। उन्हें सरकार की इस नीति पर कभी क्रोध आता है तो कभी हैरत होती है। उन्हें लगता है कि उन्हें फिजूल में रिटायर कर दिया गया। बस इसी विचार के बाद बूढ़ों और जवानों में जबरदस्त खाई खुद जाती है।
पिछले दिनों मेरी गली के चार बूढ़ों ने अपात बैठक बुलाकर तय किया कि सरकार और नौजवानों से रोने-धोने, गिड़गिड़ाने आदि से न तो कोई सुविधा मिलेगी और न ही बाकी दिन कटेंगे। इस पहाड़ जैसी जिन्दगी को अपने तरीके से काटना होगा। चारों बूढ़े इस आइडिया पर एक मत हुए कि शाम के वक्त सभी एक साथ घर के आगे सड़क पर बैठेंगे। तीन-चार घण्टे मौज-मस्ती में गुजरेंगे। बीच-बीच में चाय-चुल्लड़ होगी। आदर्श,नैतिकता जैसे उबाऊ विषयों पर आपस में बातचीत नहीं होगी पर यदि कोई राहगीर भूले भटके अपने पास कुछ पल को ठहर जाऐ तो आदर्ष, नैतिकता, महाभारत, रामायण, वर्तमान समय में मूल्यों का अवमूल्यन आदि विषयों पर ही अपनी बातचीत केन्द्रित की जाऐगी। चारों बूढ़े बैठक में लिए फैसलों पर बेहद मगन है।
तिवारी जी चारों बूढ़ों में सीनियरमोस्ट हैं। उनके घर के बाहर लगे गुलमोहर के वृक्ष के पास शाम होते ही चारों बूढ़े आ धमकते हैं।
आज पहली बैठक थी। बैठक के सामने सड़क के दूसरी ओर रोजमर्रा के सामान की किराने की दुकान है। कालोनी वालों को इस दुकान से बहुत सुविधा है। महिलाऐं अपनी 'कम्फर्टेबिल ड्रेस' में हल्दी, नमक, धनियाँ, बिस्किट, ब्रेड आदि खरीदने आ जाती हैं। बूढ़ों को यह दृश्ये बहुत भाता है।
किसी महिला को सामान खरीदते देख बूढ़े अपना समान्य ज्ञान बढ़ाते रहते हैं। किसकी बहू है, किस शहर की है, कितने बच्चे हैं आदि की जानकारी आपस में बाट लेते हैं। त्यागी जी के बेटे की बहू है, चार साल षादी को हो गए पर बाल-गोपाल कोई नहीं जैसी आपसी जानकारी पर बूढ़े हैरत में पड़ जाते हैं। वे कोई ऊॅंच नीच होने की श्ंाका जाहिर करते हैं। एक बूढ़ा इस चर्चा को विराम देने की नीयत से कहता है कि 'पत्नी से पता करूॅंगा'। इसी तरह अनेक प्र' बैठक में अनुत्तरित रह जाते हैं। वे अगले दिन सुलझा लिए जाते हैं।
कभी-कभी ये बूढ़े सामान लेकर सामने से गुजरती महिला से घर-गृहस्थी से जुडे सवालों के बहाने बतिया भी लेते हैं। बेहद सम्मान और विनम्रता से पेश् आती ये महिला इन सीनियर सिटीजनों के रोम-रोम को कुछ क्षंण के लिए पुलकित कर देती हैं।
कहते हैं कि हमारी खुश्ी हमारे कामों को गति देती है। यही वजह है कि बूढ़ों की राह गुजरती महिलाओं से बतियाबन कर खीसें निपोरने की आदत पड़ गई है। बूढ़ों के दाँतों और घुटनों के दर्द मानो उडनछू हो गए हैं। कब्ज भी जाती रही है। लेकिन इन बूढ़ों को मोहल्ले की महिलाओं के कष्ट का तनिक भी अाभास नहीं। 'कम्फर्टेबिल ड्रेस' में किराने का सामान खरीदना इन महिलाओं के लिए अब दूभर हो गया है। ये महिलाऐं शाम को बूढ़ों की बैठक जमे, इससे पहले ही सौदा खरीदने या पड़ौसन से बतियाने जैसा काम निपटा लेती हैं। बैठक के वक्त महिलाओं ने सड़क पर चलना बन्द कर दिया है ा महिलाओं की अनुपस्थिति बूढ़ों को अन्दर ही अन्दर कचौट रही है। यह दर्द घुटनों के दर्द से बड़ा है पर कहें तो कैसे कहें और किससे कहें !
महिलाओं के नदारत होने पर बूढोंं ने राह गुजरते बच्चों से दोस्ती करने की सोची। उन्होंने खेलने जाते बच्चों से देश्-दुनिया के सामान्य ज्ञान के सवालों को पूछना श्ुरू किया। एक दिन तिवारी जी ने एक बालक से बडेृ दुलार से बात करनी चाही तो वह 'मम्मी बुला रही कहकर अदृश्यी हो गया।
इस बालक ने अपने दोस्तों को बूढ़ों की बैठक की खबर दे दी। नतीजा यह है कि बूढ़े अब सन्नाटे में बैठे हैं। गली का दुकानदार भी बूढ़ों को तिरछी नजर से देखने लगा है। उसकी दुकानदरी आधी रह गई है।
आजकल मेरी गली के सीनियर सिटीजनों को गठिया, दांत का दर्द और कब्ज ज्यादा सताने लगी है। ये बूढ़े अब बात कम कर, बाबा रामदेव की कपालभाती और अनुलोम-विलोम में ज्यादा रूचि ले रहे हैं।
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ओ0पी0आई
सत्तर बसन्त देख चुके चचा के सर के बाल सन जैसे सफेद हैं। एक दिन एक पड़ौसी ने हवेली की ढयोड़ी पर बैठे चचा के बालों की सफेदी की वजह पूछी। चचा बोले- 'बेटा ! ये बाल धूप में सफेद नहीं हुए। चचा की बात पडौसी की समझ में नहीं आई। उसने अपने मित्र को पूरा वाक्या सुनाया। मित्र चचा की फितरत से वाकिफ था। उसे मालूम था कि पिछले एक साल से चचा ने अपनी बातचीत का तौर-तरीका बदल लिया है। वह सीधे-साधे सवालों के आड़े तिरछे जबाव देते हैं। मित्र ने पड़ौसी को समझाया कि चचा का मतलब है कि उनके सन जैसे बाल अनुभव रूपी ज्ञान की निशानी है। अर्थ समझ कर पड़ौसी चचा की बुध्दि का कायल हो गया।
बुध्दि के मामले में चचा ने एक भी क्षेत्र में गच्चा नहीं खाया है। पड़ौसी को बातचीत में मजा आने लगा। उसने दूसरा सवाल दागा, 'चचा तुम बीजेपी में रहे, कांग्रेस में गए, माया और मुलायम सभी के आंगन में टहल आए हो। आजकल किस पार्टी में हो! चचा तपाक से बोले, 'ओ.पी.आई.।'
बम्पर गैद की तरह चचा की बात पड़ौसी के सर के ऊपर से फिर निकल गई। पड़ौसी बेचारा फिर सकते में। वातावरण में चुप्पी छाई रही। पड़ौसी अंग्रेजी के तीन अक्षर ओ
पी.आई. से क्या बनता है का अर्थ लगाने में माथापच्ची करता रहा लेकिन उसकी अक्ल जबाब दे गई। चचा ने तब ओ.पी.आई. का अर्थ बताया 'ओपोरच्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इ्रंडिया।' यानी 'भारत की अवसरवादी पार्टी।'
कामयाबी का फंडा बताते चचा ने कहा राजनिति में एक की कंठी लेने से जिन्दगी नहीं चलती। जैसा देष वैसा भेष की नीति सबसे अच्छी है। अपुन सभी दलों में टहल आए है। सभी दलों का एक जैसा हाल है। कुछ नेता मजे में हैं और ज्यादातर लोग घुटन भरी जिन्दगी जी रहे हैं। ये बडे नेता अपने कार्यकर्ताओं को पार्टी के प्रति वफादारी का पाठ पढाते नहीं थकते। सार्वजनिक मंच पर ये नेता विरोधी दल के नेताओं की बधिया उधेड़कर एक दूसरे के जानी दुष्मन होने का संदेष जनता को देते हैं। लेकिन निजी जीवन में रात के अंधेरे में ये नेता आपस में ऐसे मिलते हैं जैसे चोर-चोर मौसेरे भाई। इन नेताओं के झूठ-सच का सही अनुमान वोटर नहीं लगा पाता। झूठ पकड़ा न जाए इसके लिए इन नेताओं को अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है। नेताओं को हिसाब रखना पड़ता है कि पहले क्या कहा था।
बस इन्हीं सब झंझटों को देखकर हमने अपनी नई पार्टी 'ओ.पी.आई.' बनाई है। हमारी पार्टी के कुछ प्रमुख नारे हैं- 'अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता', 'चढ़ते सूरज को प्रणाम', 'डूबते जाहज को अलविदा', 'तैरते जहाज में छलांग', आदि , दल बदल कानून का विरोध करना अपुन की पार्टी का प्रमुख ऐजेन्डा है।
ओ.पी.आई. के संविधान की खूबी यह है कि कोई भी सदस्य किसी अन्य दल में मनचाहे दिनों के लिए कभी भी आ जा सकता है। वह दूसरे दल में भले ही रहे, ओ.पी.आई.से उसकी सदस्यता समाप्त नहीं होगी। चचा ने अपनी इस पार्टी की एक अन्य विशेष्ताभ बताते हुए कहा कि अन्य दलों के लोगों को मुंह में राम बगल में छुरी की नीति अपना कर दो-दो मुखौटे अपने पास रखने पड़ते हैं। लेकिन इसके ठीक विपरीत ओ.पी.आई. के सदस्यों को अपने असवरवाद को छुपाने के लिए किसी ढ़ोंग की जरूरत नहीं।
इंदिरा गांधी जैसे कद्दावर वृक्ष के गिरने के बाद धरती हिली। मसलन, दंगे फसाद हुए, बाबरी मस्जिद टूटी, गोधरा कांड हुआ, गुजरात में मोदी की प्रयोगशाला बनी। इन सब कमों को अंजाम देने बाले बेचारे नेता 'मैं नहीं' 'मैं नहीं' कहते घूम रहे हैं।
'ओ.पी.आई.' पार्टी की नीति-रीति एक है यानि दो टूक जुबान। ईमानदारी इसकी आधाराश्ला है। हम जो हैं वो हैं। दुराव-छपाव की कोई जरूरत नहीं। तभी तो पार्टी कार्यकर्ता अपने दिन की श्रूआत इस नारे से करते हैं - 'गर्व से बोलो ओ.पी.आई'।
चचा के मकान पर ओ.पी.आई. का झंडा लहर-लहर लहरा रहा है। ओ.पी.आई. पार्टी के झंडे की तरफ बीजेपी, कांग्रेस, बीएसपी, एसपी, सीपीएम, सीपीआई आदि दलों के झंडे ललचाई नजर से देख रहे हैं। चचा के झंडे को मांगने वालों की भीड़ लगातार बढ़ रही है।
सत्तर बसन्त देख चुके चचा के सर के बाल सन जैसे सफेद हैं। एक दिन एक पड़ौसी ने हवेली की ढयोड़ी पर बैठे चचा के बालों की सफेदी की वजह पूछी। चचा बोले- 'बेटा ! ये बाल धूप में सफेद नहीं हुए। चचा की बात पडौसी की समझ में नहीं आई। उसने अपने मित्र को पूरा वाक्या सुनाया। मित्र चचा की फितरत से वाकिफ था। उसे मालूम था कि पिछले एक साल से चचा ने अपनी बातचीत का तौर-तरीका बदल लिया है। वह सीधे-साधे सवालों के आड़े तिरछे जबाव देते हैं। मित्र ने पड़ौसी को समझाया कि चचा का मतलब है कि उनके सन जैसे बाल अनुभव रूपी ज्ञान की निशानी है। अर्थ समझ कर पड़ौसी चचा की बुध्दि का कायल हो गया।
बुध्दि के मामले में चचा ने एक भी क्षेत्र में गच्चा नहीं खाया है। पड़ौसी को बातचीत में मजा आने लगा। उसने दूसरा सवाल दागा, 'चचा तुम बीजेपी में रहे, कांग्रेस में गए, माया और मुलायम सभी के आंगन में टहल आए हो। आजकल किस पार्टी में हो! चचा तपाक से बोले, 'ओ.पी.आई.।'
बम्पर गैद की तरह चचा की बात पड़ौसी के सर के ऊपर से फिर निकल गई। पड़ौसी बेचारा फिर सकते में। वातावरण में चुप्पी छाई रही। पड़ौसी अंग्रेजी के तीन अक्षर ओ
पी.आई. से क्या बनता है का अर्थ लगाने में माथापच्ची करता रहा लेकिन उसकी अक्ल जबाब दे गई। चचा ने तब ओ.पी.आई. का अर्थ बताया 'ओपोरच्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इ्रंडिया।' यानी 'भारत की अवसरवादी पार्टी।'
कामयाबी का फंडा बताते चचा ने कहा राजनिति में एक की कंठी लेने से जिन्दगी नहीं चलती। जैसा देष वैसा भेष की नीति सबसे अच्छी है। अपुन सभी दलों में टहल आए है। सभी दलों का एक जैसा हाल है। कुछ नेता मजे में हैं और ज्यादातर लोग घुटन भरी जिन्दगी जी रहे हैं। ये बडे नेता अपने कार्यकर्ताओं को पार्टी के प्रति वफादारी का पाठ पढाते नहीं थकते। सार्वजनिक मंच पर ये नेता विरोधी दल के नेताओं की बधिया उधेड़कर एक दूसरे के जानी दुष्मन होने का संदेष जनता को देते हैं। लेकिन निजी जीवन में रात के अंधेरे में ये नेता आपस में ऐसे मिलते हैं जैसे चोर-चोर मौसेरे भाई। इन नेताओं के झूठ-सच का सही अनुमान वोटर नहीं लगा पाता। झूठ पकड़ा न जाए इसके लिए इन नेताओं को अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है। नेताओं को हिसाब रखना पड़ता है कि पहले क्या कहा था।
बस इन्हीं सब झंझटों को देखकर हमने अपनी नई पार्टी 'ओ.पी.आई.' बनाई है। हमारी पार्टी के कुछ प्रमुख नारे हैं- 'अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता', 'चढ़ते सूरज को प्रणाम', 'डूबते जाहज को अलविदा', 'तैरते जहाज में छलांग', आदि , दल बदल कानून का विरोध करना अपुन की पार्टी का प्रमुख ऐजेन्डा है।
ओ.पी.आई. के संविधान की खूबी यह है कि कोई भी सदस्य किसी अन्य दल में मनचाहे दिनों के लिए कभी भी आ जा सकता है। वह दूसरे दल में भले ही रहे, ओ.पी.आई.से उसकी सदस्यता समाप्त नहीं होगी। चचा ने अपनी इस पार्टी की एक अन्य विशेष्ताभ बताते हुए कहा कि अन्य दलों के लोगों को मुंह में राम बगल में छुरी की नीति अपना कर दो-दो मुखौटे अपने पास रखने पड़ते हैं। लेकिन इसके ठीक विपरीत ओ.पी.आई. के सदस्यों को अपने असवरवाद को छुपाने के लिए किसी ढ़ोंग की जरूरत नहीं।
इंदिरा गांधी जैसे कद्दावर वृक्ष के गिरने के बाद धरती हिली। मसलन, दंगे फसाद हुए, बाबरी मस्जिद टूटी, गोधरा कांड हुआ, गुजरात में मोदी की प्रयोगशाला बनी। इन सब कमों को अंजाम देने बाले बेचारे नेता 'मैं नहीं' 'मैं नहीं' कहते घूम रहे हैं।
'ओ.पी.आई.' पार्टी की नीति-रीति एक है यानि दो टूक जुबान। ईमानदारी इसकी आधाराश्ला है। हम जो हैं वो हैं। दुराव-छपाव की कोई जरूरत नहीं। तभी तो पार्टी कार्यकर्ता अपने दिन की श्रूआत इस नारे से करते हैं - 'गर्व से बोलो ओ.पी.आई'।
चचा के मकान पर ओ.पी.आई. का झंडा लहर-लहर लहरा रहा है। ओ.पी.आई. पार्टी के झंडे की तरफ बीजेपी, कांग्रेस, बीएसपी, एसपी, सीपीएम, सीपीआई आदि दलों के झंडे ललचाई नजर से देख रहे हैं। चचा के झंडे को मांगने वालों की भीड़ लगातार बढ़ रही है।
Tuesday, March 16, 2010
अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता
चचा सुखराम की स्कूली शिक्षा न के बराबर है लेकिन उनका दिमाग गजब की विश्लेषण क्षमता रखता है। यही कारण है कि उनके इर्दगिर्द पढ़ेलिखों की भीड़ सदैव रहती है। बहुत सी बातें बहुतों की समझ में नहीं आती पर इहें समझना चचा के लिए मानो बच्चों का खेल है।खचाखच भरी बैठक में कहावतों पर बात चल रही थी। चचा का कहना था का शानदार और जानदार कहावतों को गढ़ने वाले विद्वान ही नहीं होते बल्कि बिना डिग्री वाले लोग कहावतों को जन्म देकर समज को रोशनी दिखाते हैं।
इसके बाद चचा मुख्य बात पर आए। बोले- 'मैंने अपने इलाके के विधायक पिद्दीलाल से पूछा कि तुम अपनी जनता से वोट बड़ी विनम्रता से माँगते हो, षानदार जीत हासिल करते हो लेकिन कुर्सी मिलते ही ऐसे ऑंखें फेर लेते हो जैसे जानते ही नहीं।' इस पर विधायक जी बोले- 'देखो चचा ! चुनाव में वोटर हमारी बड़ी दुर्गति करता है। हम घर-घर जाते हैं, हाथ जोड़ते हैं, पैर पकड़ते हैं। किसी को चाची, किसी को माताजी,किसी को बहनजी तो किसी को बूआजी कहकर अपनी जुबान सुखाते हैं तब जाकर उनके कलेजे में समाकर जीत हासिल करते हैं।छोटीसी मषीन का नन्हा सा बटन दबाने में वोटर की मानो नानी मरती है। चचा ! अब आप ही बताओ। एक भलामानस हारने पर गाली देगा और जीतने पर मुंह फेरेगा कि नहीं। अपुन का सिध्दान्त है 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता।'
विधायक पिद्दी की कहावत में तर्क की कोई कमी नहीं थी सभी को भाया। चचा बोले-'एक किस्सा और सुनो। '
यह बात उच्च शिक्षा के कामयाब दुकानदार की है। कई इंजीनियरिंग कालेज का मालिक है वह। विधायक पिद्दी का यार है सो उसकी कहावत को सीने से लगाए फिरता है। एक दिन बोला कि ' मैं अपने कालेज में 7-8 हजार में मास्टर रखता हूं। ये मास्टर 4-5 वर्ष में तरक्की पाकर 13-14 हजार तक पहुँच जाते हैं। तब मास्टरों का यह वेतन मेरी आंखों में खटकने लगता है। उन्हें नौकरी से निकालने का फैसला कर लेता हूँ। कालेज से निकालने से 6 माह पूर्व उसकी कमियां निकालना, मीमो थमाना, डांटना-डपटना षुरू कर देता हूं। इतना टेंशन देता हूं कि वह खुद बखुद इस्तीफा देकर नौ-दो ग्यारह हो जाता है। उसके जाने के बाद मैं उसकी जगह 7-8 हजार पर फिर से नियुक्ति कर लेता हूं। यह सब 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता' के सिध्दान्त पर करता हूँ।
चचा ने अफसरों, अपने नजदीकी रिश्तेदारों, पड़ोसियों, मित्रों के ऐसे अनेक किस्से सुनाए जो विधायक पिद्दी की कहावत पर अमल कर तरक्की की चौपड़ पर कुलांचें मार रहे हैं। बैठक में बैठे कई लोग पछता रहे थे कि विधायक पिद्दी को उन्होंने गुरू क्यों नहीं बनाया। चचा ने अपनी वाणी को विराम इस नैतिक सलाह से दी- 'निजी उत्थान करना है तो उठते-बैठते इस कहावत का जाप करो और मिलजुल कर समाज का भला करना है तो जैसे वैष्णों देवी के दर्षन के लिए चढ़ाई करते भक्तजन उद्धोष करते हैं 'जोर से बोलो जय माता की ', वैसे ही सुबह पार्क में और षाम को गली मोहल्लों में नारे लगाओ, 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता।'
इसके बाद चचा मुख्य बात पर आए। बोले- 'मैंने अपने इलाके के विधायक पिद्दीलाल से पूछा कि तुम अपनी जनता से वोट बड़ी विनम्रता से माँगते हो, षानदार जीत हासिल करते हो लेकिन कुर्सी मिलते ही ऐसे ऑंखें फेर लेते हो जैसे जानते ही नहीं।' इस पर विधायक जी बोले- 'देखो चचा ! चुनाव में वोटर हमारी बड़ी दुर्गति करता है। हम घर-घर जाते हैं, हाथ जोड़ते हैं, पैर पकड़ते हैं। किसी को चाची, किसी को माताजी,किसी को बहनजी तो किसी को बूआजी कहकर अपनी जुबान सुखाते हैं तब जाकर उनके कलेजे में समाकर जीत हासिल करते हैं।छोटीसी मषीन का नन्हा सा बटन दबाने में वोटर की मानो नानी मरती है। चचा ! अब आप ही बताओ। एक भलामानस हारने पर गाली देगा और जीतने पर मुंह फेरेगा कि नहीं। अपुन का सिध्दान्त है 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता।'
विधायक पिद्दी की कहावत में तर्क की कोई कमी नहीं थी सभी को भाया। चचा बोले-'एक किस्सा और सुनो। '
यह बात उच्च शिक्षा के कामयाब दुकानदार की है। कई इंजीनियरिंग कालेज का मालिक है वह। विधायक पिद्दी का यार है सो उसकी कहावत को सीने से लगाए फिरता है। एक दिन बोला कि ' मैं अपने कालेज में 7-8 हजार में मास्टर रखता हूं। ये मास्टर 4-5 वर्ष में तरक्की पाकर 13-14 हजार तक पहुँच जाते हैं। तब मास्टरों का यह वेतन मेरी आंखों में खटकने लगता है। उन्हें नौकरी से निकालने का फैसला कर लेता हूँ। कालेज से निकालने से 6 माह पूर्व उसकी कमियां निकालना, मीमो थमाना, डांटना-डपटना षुरू कर देता हूं। इतना टेंशन देता हूं कि वह खुद बखुद इस्तीफा देकर नौ-दो ग्यारह हो जाता है। उसके जाने के बाद मैं उसकी जगह 7-8 हजार पर फिर से नियुक्ति कर लेता हूं। यह सब 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता' के सिध्दान्त पर करता हूँ।
चचा ने अफसरों, अपने नजदीकी रिश्तेदारों, पड़ोसियों, मित्रों के ऐसे अनेक किस्से सुनाए जो विधायक पिद्दी की कहावत पर अमल कर तरक्की की चौपड़ पर कुलांचें मार रहे हैं। बैठक में बैठे कई लोग पछता रहे थे कि विधायक पिद्दी को उन्होंने गुरू क्यों नहीं बनाया। चचा ने अपनी वाणी को विराम इस नैतिक सलाह से दी- 'निजी उत्थान करना है तो उठते-बैठते इस कहावत का जाप करो और मिलजुल कर समाज का भला करना है तो जैसे वैष्णों देवी के दर्षन के लिए चढ़ाई करते भक्तजन उद्धोष करते हैं 'जोर से बोलो जय माता की ', वैसे ही सुबह पार्क में और षाम को गली मोहल्लों में नारे लगाओ, 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता।'
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