Friday, July 29, 2011

मेलबर्न--५, अछा है तो सीखना होगा

मेलबर्न--५,   अछा है तो सीखना होगा
सवा दो करोड़ की आबादी वाला आस्ट्रेलिया सभी को भा रहा है..अपनों की कमी झेलने वाले भी मोका मिलते ही इसकी तारीफ में बह जाते हैं. यहाँ आदमी अपने टेलेंट को उभ़ार सकता है.यह बात एक टेक्सी ड्राईवर और उसकी बीबी की है.उनका कहना है की पिछले ११ साल में उन्हें इस देश से कोई शिकायत नहीं. इस देश में अनेक चीजें  yesi   है जिन्हें सीखा जा सकता है.
आस्ट्रेलिया का इतिहास ३ सो सालों से कम का है .इस इतिहास का प्रदर्शन करने में सरकार की मेहनत साफ झलकती है.१७७८ में अन्रेजों ने यहाँ कदम रख्खा . खूब मारकाट की .इस धरती के इतिहास के काले पन्ने को  मेलबर्न के कई मूजियम में शानदार और ईमानदारी से दर्शाया गया है.मेलबर्न में रुकने का यही तो मजा है की यहाँ के मूजियम और लाब्रेरारी का भ्रमण  करने में आनद की अनुभूति होती  है. स्टेट लाब्रेररी में पुस्तके ही नहीं वरन यहाँ की कई गेलरी किसी मूजियम से कम नही.मूजियम में दर्शकों को केसे आकर्षित किया जाता है ,कलाक्रतिओं को केसे प्रदर्शित किया जाना चाहिए यह सब य्याहान से शिखा जाना चाहिए.१८ वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में मेलबर्न की पुरानी जेल भी मूजियम सरीखी है इस जेल की एक  कालकोठरी में फतेहचंद ऑफ इंडिया लिखा मिला. इस भारतीय ने यहाँ किसी का maar     डाला था   किया था और फासी की सजा पाई थी. इसी जेल में मुझे नेड केली के बारे में जानने का मोका मिला. २३ साल के इस आयरिश लड़के को १८८० में फांसी पर लटकाया गया. इसने अग्रेजी हुकूमत को ४ दोस्तों के साथ मिलकर जबरदस्त चुनोती दी थी. नेड पर ६-७ फिल्में बन चुकी हैं.नेड पर अलग आलेख बन सकता है. 
मेलबर्न में २३३ देशों के लोग बसे है. भारतीयों की रुची दिनप्रतिदिन  बढ रही है. आस्ट्रलिया का अतीत और वर्तमान किसी फिल्मी कहानी से कम रोचक नहीं.यंहा की सरकार इस रोचकता को बढाने में किसी मायने  में कम नही. अच्छी बातों को तो सीखा  जा सकता है. 
 

 
 
 

Tuesday, July 26, 2011

Melbourne ----3


परदेश तो परदेश है.
 इंसान ने जब से आँखें खोली है वह जीवन को बेहतर और बेहतर बनाने की दिशा में संघर्षरत है.यूरोप ,अमेरिका और आस्ट्रेलिया एशिया के बाशिंदों को सदेव से आकर्षित करते रहे है.साधन संपन्न लोग अपने बच्चों को विदेश भेजकर अपने लोगो में विशिष्ट दर्जा प्राप्त करते रहे है. गांधी नेहरु के वक्त में परदेश जाना बहुत मुश्किल था. आजकल अपेक्षाकृत सरल है. इसी कारण में बार बार मेलबर्न आ जाता हूँ. अपने हर प्रवास में में मेलबर्न की सड़कों को नापता हूँ ,यहाँ के म्यूजियम को निहारता हूँ ,गोरे और उनकी मेमो-बच्चों की जीवन शेली को जानने की कोशिश करता हूँ .साथ ही कल्पना करता हूँ की यह सब वातावरण हमारे देश में हमारी सरकारे क्यों नहीं दे पाती? ६ दशक से अधिक निकल गए देश को आजाद हुए.
\ जुलाई के मध्य में में जब यहाँ आया तब अपने यहाँ बाबा रामदेव,अन्ना हजारे, सुरेश कल्मारी ,और यु पी में चुनाव की तेयार करती राजनीतिक पार्टियों और राजनीत को व्यपार समझने वाले नेताओं को छोड़कर आया था. इन्ही की चर्चाएँ अखबारों की सुर्खियाँ थीं.
यहाँ. आकर मुझे अजीब सा लगा.मेलबर्न में सब कुछ शांत.टंड जरूर पर सुखद .सड़कें साफसुथरी.और इन पर तेज तेज कदमों से अपने अपने काम पर जाते लोग.जेसे दिल्ली का कनाट प्लेस वेसी ही भीड़ भाड मेलबर्न के फेडरेशन स्कायर पर मिलेगी .यह स्थान मोज मस्ती और सांस्कृतिक गतिविधिओं का अदभुत केंद्र है .ऐसा नहीं सरकार के पास समस्याएं नहीं .मजेदार और सुखद बात यह है की सरकार जनता की मांग उठने से पहले जनता की असुविधाओं पर ध्यान देना शुरू कर देती है.में विक्टोरिया पार्लियामेंट में एक घंटे का प्रश्न काल में गया था. पानी ,बिजली और शिक्षा ,ट्रेफिक आदि मुद्दों चर्चा के दोरान सदस्यों की हास्य और व्यंगात्मक शेली से संसद गूंज रही थी .नेहरु के युग में. हमारे यहाँ ऐसा होता था. एस सन्दर्भ में तरकेशारी सिन्हा का नाम याद किया जा सकता है. लेकिन अब यह सपना है.पुस्तकालय  और समुदायक स्वास्थ्य केन्द्रों पर सरकार का ध्यान पूरा पूरा है .इन जगहों पर जाकर तबियत खुश हो जाती है.इलाज और दवाएं चाहे कितनी आधुनिक और बिना मिलावट के क्यों न हो यहाँ बीमार होने पर अपने वतन की याद रह रह कर आती है.बीमार व्यक्ति को डाक्टर से वक्त लेने में १५-१५ दिन इन्तजार करना पड़ता है. चिकितसकों तथा नर्सों  की कमी  है. सरकार इन्हें बसाने में वरीयता दे रही है.
गत वर्ष मेलबर्न में हुए नस्ली हमलों ने भारतियों को हिला दिया. यहाँ आने वाले भारतीय छात्रों की सखा में गिरावट आ गयी.सरकार की विशव स्तरपर छवि धूमिल हुई,साथ ही अर्थ व्यवस्था पर असर पड़ा.  परिणामस्वरूप सरकार ने सख्त कदम उठाय और गोरे हमलावरों पर लगाम लगाईं.
मेरी मुलाक़ात  बहुत से भारतीयों से हुई .कोई १० साल से है तो कोई २-३ सालों से. यहाँ की साफ सुथरी जिन्दगी से  सब खुश हैं.जीवन स्तर अछा है लेकिन पूरी जिन्दगी बसने के नाम पर हिचकी लेते नजर आते है. अपनी अपनी  जुबान में कहते  है की अपनों की याद आती  है.कुछ दिनों काम कर लें फिर वापस तो जाना ही है.गोरे शिष्टाचार में किसी से कम नहीं  पर इनके मन में क्या है नहीं मालुम .चाहे पी .आर  ले लो या सिटिजनशिप परदेश तो परदेश है.

Thursday, July 21, 2011

मेलबर्न आजकल ---२

गोरे काले का भेद तो है
 साफ सुथरी हवा,पानी,मौज मस्ती के बेहिसाब साधन घुमने  फिरने की बेहिसाब जगह, प्रदुषण नाम की चीज नहीं,मिलावट और भ्रटाचार का नामोनिशान नहीं ,मंत्री और अफसरों की बेईमानी के किस्से  नहीं.यह सब मेलबर्न की धरती पर दिखाई दे रहा है --हर क्षण .लेकिन एक जहर ऐसा है जो घुला हुआ है इस शानदार धरती की गोरी चमड़ी में .रंगभेद नाम का यह जहर मेरे अंदर दहशत पैदा कर चुका है. सन २००९ में ऐसा नहीं था जब में दिसम्बर माह में मेलबर्न की सड़कों पर बेखोफ -बेझिझक  पैदल या ट्राम में घूमता था. पिछले साल इन्ही सडकों पर घटी नस्ली घटनायों ने सोचने पर मजबूर किया है की  रहने के लिए दुनिया के  शानदार शहरों में शुमार ही नहीं बल्कि अब्बल आने वाले मेलबर्न शहर में यूरोप की तरह रंगभेद के गुबार क्यों  उठने लगे हैं ?क्या यह बात सही है?
मेरा उत्तर हाँ है और इसी कारण में अपने १ माह के मेलबर्न प्रवास में समुचित सावधानी बरत रहा हूँ .
गोरों के अंदर मौजूद चमड़ी भेद मुझ जेसे इंसान में ही नहीं यहाँ की सरकार और अन्य स्वतन्त्र संस्थायों को भी चितित किये है. मेलबर्न रेडिओ  स्टेशन जिसे एस बी एस के नाम से जाना जाता है ने एक सर्वे कराया है की यहाँ वास्तव में रंगभेद   है या नहीं? आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवेर्सिटी भी इस विषय पर काम कर रही है.  यही पर मिली एक जानकारी के मुताविक एक गोरे छात्र को १० स्थानों पर आवेदन करने पर नोकरी मिल जाती है जब की एशियन को नोकरी के लिए १६ स्थानों पर आवेदन करना पड़ता है.
पिछले साल भारतीय समुदाय के लोगों के साथ यहाँ जो कुछ हुआ हम सब चिंतित हुए, यहाँ की सरकार भी. सरकार द्वारा की गयी सक्ती के बाद
यहाँ बसे भारतियों में फिर से खुली हवा में सांस लेने की हिम्मत जगी है. पॉइंट कुक जहां मुझे १ मiह रहना है ,में कई  भारतीय मिले जो यहाँ की नागरिकता के लिए आवेदन करने की सोच रहे हैं.मेरे जेसे उम्रदराज के लिए यहाँ बसने का सोच मन को नहीं भाता पर जिंदगी की शुरुआत करने वाले नोजवान के लिए यहाँ बसने का विचार बुरा नहीं.
और रही बात रंगभेद और फिर फिर होने वाले नस्ली हमलो की, इन्हे पूरी तरह समात करना किसी सरकार के बूते की बात नहीं. इतिहास  बताता है सन १७७८ में यूरोपियनओं  ने आस्ट्रेलिया की धरती पर कदम रखा ,तब से वे इस रंगभेद  की बुराई से ग्रसित है.
हम भारतियों को यहाँ से पलायन करके नहीं बल्कि यहाँ जमे रहकर रंगभेद के खिलाफ  वातावरन बनाना होगा तभी हम  अपने देश का नाम रोशन कर सकते हैं. ..

मेलबर्न आजकल

मेलबर्न आजकल
 
 मेलबर्न से २५ किलोमीटर दूर बसे उपनगर पॉइंट कुक में डेरा डाले मुझे लगता है की यहाँ  सरकार और जनता एकदूसरे के पूरक है.दोनों में किसी बात का कोई टकराव नहीं. सरकार जीवन को बेहतर बनाने में लगी   है तो तेज कदमो से सड़कें नापते गोरे काले सभी सरकार के बनाए कायदे कानूनों का पालन करने में मगन हैं .
डेड से तीन करोड़ रू.  की लागत वाले वातानुकूलित  मकान और शानदार बाजार  देखकर मन में विचार आता है की हमारे देश के गाँव की ज़मीन सुनिओजित शहर विकसित क्यों नहीं कर पाती? गावों के लोग शहर की ओर क्यों पलायन कर रहे हैं? यहाँ ऐसा नहीं.  शहर की हर सुविधा यहाँ है तो कोन मेलबर्न शहर के मल्टीस्टोरी इमारतों में रहेगा? रेल,बस, कोलोनाजेशन सब कुछ प्राइवेट लेकिन सरकार के बनाए कानूनों के तहत. इन कानूनों
 का पालन कराने में सरकार की इच्छा शक्ति और ईमानदारी साफ़ झलकती है.ऐसा नहीं की शरारती और अपराधी किस्म के लोग यहाँ हे ही नहीं .ये अपराधी लोग सरकारी डंडे से जरूर डरते होंगे तभी पॉइंट कुक  जेसे दर्जनों उपनगरों में लकड़ी और काच के बने मकानों में लोग बेखोफ रह  रहे हैं. 
पॉइंट कुक की आबादी २५ हजार  से अधिक नहीं.  फिर भी माल्नुमा संस्कृति से लेस   बाजार में सरकारी  लाब्रेरी है ,पूरी तरह आधुनिक.इस लाब्रेरी में हिंदी की एक अलमारी देखकर मन प्रफुलित हुआ .गिरिराजकिशोर और पुष्पा मैत्री की किताबों  को छूकर देखा. मालूम करने पर पता चला की इस इलाके में हिंदी पाठकों की संखा अच्छी खासी है. सन २०३० में सरकार ने इस उपनगर की आबादी ५० हजार से ज्यादा करने की ठानी  है.  
अमन चेन और प्रदुषण मुक्त  इस उपनगर के माल में यह देखकर अचरज हुआ की हर भारतीय दूसरे लोगों की तरह हर कायदे क़ानून को  अपना रहा था लेकिन अपने देश में इसी भारतीय को क़ानून को टेंगा दिखाने में मजा आता  है.बंद करता हूँ यह कहकर .......जेसा देश वेसा भेष
 
    
 
 
 
   

Saturday, May 7, 2011

अन्ना मुझे माफ करना

अशोेक बंसल
जन्तर मन्तर पर धरने पर बैठे अन्ना को देखने-सुनने प्रो0 मनसुखलाल भी गए थे। उनके कलेजे में बरसों से दबी-बैठी नैतिकताओ में उबाल आ गया। कई प्रण एक साथ किए। एक भी क्लास नहीं छोेड़ेंगे। उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन ईमानदारी से करेंगे। सामाजिक जीवन में पुराने सिद्धान्त ‘न घूस लो न घूस दा’े पर चलेंगे। इसी उधेड़बुन में मनसुळलाल दिल्ली स्टेशन पहुंचे तो आगरा जाने वाली टेªन ने सीटी मार दी। मनसुख भागे। सामने थ्री टियर का डिब्बा था। चढ़ गए।
साधारण टिकिट और डिब्बा रिजर्व/टीसी को आना ही था। काले कोट को देखकर मनसुख की सांसे ऊपर नीचे होनेे लगी। रसीद काटने पर आमादा टीसी से प्रो0 मनसुख ने रिजर्व डिब्बे में चढ़ने की मजबूरियां गिनाई।अध्यापकों पर रहम करने की विनम्र अपील की। घाट घाट का पानी पीने वाला टीसी टस से मस न हुआ। तब मनसुख झुके। फौरन सौ का पत्ता निकाला और टीसी को चलता किया। मनसुख के कलेजे की नैतिकता ने हिचकी ली। बोले ‘अन्ना मुझे माफ करना।’
अगले दिन मनसुख कॉलेज में शिक्षक संघ की बैठक में पहुंचे। डी.ए. के एरियर के बिल को डी.आई.ओ.एस. का बाबू पास करने की एबज में दक्षिणा मांग रहा था। शिक्षकों में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने की मांग उठ रही थी। मनसुख ने जन्तर मन्तर पर बैठे अन्ना को अपनी ताकत बताया। तभी एक शिक्षक ने दुनियादारी का पाठ पढाया ‘‘बाबू बगल के कमरे में है। मात्र 50 रू0 प्रति शिक्षक चन्दा करो। दस हजार रु प्रति शिक्षक का लाभ है। जितनी देर उतनी ब्याज की हानि।’’ इस व्यावहारिक राय पर कई शिक्षकों के मुंह में मानो डाट लग गई। कुछ बड़बड़ाए। आनन फानन में बाबू की रिश्वत का चन्दा हुआ। मनसुख को यादा आया ‘जैसा देश वैसा भेष’’। तत्काल 50 रू0 जेब से निकाले और बुदबुदाए, ‘‘अन्ना मुझे माफ करना।’’
कॉलेज से घर जाते मनसुख को लगा किवह रक्तदान शिविर में टेबिल पर लेटे है और उनकी बांह में ठुंसी सुई में उनके शरीर से खून नहीं उनकी आत्मा के कण निकल रहे हैं। घर पर स्कूटर रोका तो मीटर रीडर मीटर में तांकझांक कर रहा था। बोला ‘सर आपके मीटर से छेड़छाड़ हुई है। सील टूटी है। शिकायत कर रहा हूं, यहां हस्ताक्षर करिए।’ मनसुख ने चाल चली ‘तुम्हे मालूम है अन्ना अनशन पर क्यों बैठे हैं? मीटर रीडर बोला‘ सर! इसीलिए तो अब हर काम कायदे से होगा।’ मनसुख को गान्धी की याद आई। फौरन 5 सौ का नोट निकाला और मीटर रीडर की मुठ्ठी गरम कर दी। मीटर रीडर के मुंह से शिष्टाचारवश निकला ‘नमस्कार’ लेकिन मनसुख के मुख से ‘‘अन्ना मुझे माफ करना’ही निकला ।
मनसुख को एम.एस.सी. गणित की कापियां जांचनी थी। 15 रू0 प्रति कॉपी मिलेगा। सोचा कुछ कापियां निपटा लूं। मनसुख ने लाल कलम थामी और जांचने बैठ गए। पहली काफी के आठ दस पन्न पलटे ही थे कि उनकी नजर कॉपी में लिखी चिट्ठी पर गई। लिखा था-‘ मुझे 75 फीसदी चाहिए। आपकी तबियत खुश कर दूंगा। मेरा मोबाइल नं. .................... है।’’
मनसुख की अंगुलियां मशीन बन गई। झटपट मोबाइल उठाया और छात्र का नम्बर दबा दिया। दूसरे छोर से जैसे ही आवाज आई मनसुख ने साहस बटोरा और बोले ‘तुमने अपनी कॉपी में मोबाइल नम्बर लिखा है’’ छात्र ने स्वीकारा, ‘‘यस सर!’’ आदेश करें। मनसुख ने ऐसे कहा जैसे छात्र पर उनकी रकम पहले से जमा हो............‘दो हजार रु का रिचार्ज कूपन डलवा दो।’ मनसुख ने फोन पटका ही था कि उनके सैल में एसएमएस की घन्टी बजी। सन्देश पढ़ा। लिखा था ‘28 रू. थे। अब 2028 रू0 हैं।’’ मनसुख अपने हुनर  पर मन्दमन्द मुस्काए पर दबी जुबान से एक बार फिर बोले-‘अन्ना मुझे माफ करना।’’
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Thursday, April 21, 2011

बाघा सीमा पर एक शाम
अमृतसर से 28किमी दूर भारत पाक सीमा बाघा पर होने वाली सैनिक परेड को देख मन प्रसन्न हुआ। देशप्रेम और भाईचारे का सन्देश देती इस परेड को निहारने वाले दोनों देश के लोग किसी मायने में एक दूसरे के दुश्मन नजर नहीं आए।
हमारी देश के सीमा सुरक्षा बल के सैनिक और पाक के रेंजर एक लय और ताल में परेड कर अपने अपने राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान दे रहे थे। दोनों देश के लोग तालियाँ बजाकर स्वतःस्फूर्ति देशप्रेमपरक सांस्कतिक  आयोजन  का तुत्फ ले रहे थे।
बाघा सीमा पर इस रंगारंग व विलक्षण आयोजन का प्रचलन पुराना है दोनों देशों के हजारों लोग प्रतिदिन बाघा सीमा पर इकट्ठे होते हैं तब किसी के हृदय में एक दूसरे के प्रति घृणा की भावना पैदा नहीं होती बल्कि हम सोचने पर मजबूर होते हैं कि भारत जैसे देश का बटबाराा 1947 में क्यों हुआ। यदि शातिर  अंग्रेजों के कारण ऐसा हुआ तो अब हम अमन-चैन से क्यों नहीं रह पाते। क्यों भारत-पाक युद्व हुआा क्यों कारगिल की लड़ाई हुई। क्यों मुंबई पर आतंकी हमला होता है और क्यों संसद पर हमला और क्यों नहीं सुलझने का नाम ले रही कशमीर की समस्या!
सीमा पर पहुंचने के लिए लगाए गए प्रवेश द्वार को पार करते वक्त एक बस ने हार्न बजाया। अरे यह क्या! यह बस लाहौर-दिल्ली के बीच चलने वाली बस थी। यह बस सेवा 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के समय में प्रारम्भ हुई थी। इस सेवा के प्रथम दिन का सीधा प्रसारण दूरदर्शन पर मैं मथुरा में अपने घर पर देख रहा था।  टीवी पर लाइव प्रोग्राम देख मेरी आंखे नम हो गई थीं। अटल जी ने लाहौर जाने वाली बस को हरी झण्डी दिखाई थी। मुझ पर रूका नहीं गया और एक कविता अटलजी के इस अच्छे प्रयास को समर्पित कर दी। यह बात अलग है कि उन्ही के काल में कारगिल की लड़ाई हुई तो अटलजी का व्यक्तित्व सवालिया निशानों से घिर गया।
कविता इस प्रकार है
- अटल तुम्हारे  चरण कहाँ है, छूने को मन करता है
   सरहद के उस पार खड़े तुम, जनजन वन्दन करता है।
पाँच दषक की घृणा-वितृष्णा, छूमंतर क्षंणभर में कर दी
ज्ञान ज्योति गौतम गांधी जी, सबके जनमानस में भर दी।
बस बस बहुत हो चुका कहकर, जाकर सरहद पर बस कर दी
इस बस में अब फूल खिलेंगे, अपनेपन की खुषबू भर दी
उज्जवल यह आचरण तुम्हारा, कलुष हृदय का हरता है
अटल तुम्हारे चरण कहां है छूने का मन करता है
बन्द पड़ी इस सीमा पर अब बस के पहिए गुजरेंगे
सूने पड़े हाषियों पर भी मंगल स्वास्ति चिन्ह उभरेंगे
बन्दूकें फेंकी जाएंगी, सुमन शांति के मुस्कायेंगे
भाई-भाई रहे, रहेंगे सारे जग को बतलायेंगे
षान्ति संकल्प तुम्हारा मन में दीपक आषा के धरता है
अटल तुम्हारे चरण कहां है छूने को मन करता है
बर्लिन की दीवार बना था, अविष्वास अब ढहता है
हाथ मिल ेअब गले मिलेंगे, मन अपना यह कहता है
आरोपों का अन्त हुआ अब, सब जनमानस उत्साहित है
दोषारोपण खत्म हुए लो, शुभ पंथ आलोकित है।
सुंखद शांति परचम लहराया, यष हर और बिखरता है
अटल तुम्हारे चरण कहां है, छूने को मन करता है

Friday, September 10, 2010

बन्दूक का सिपाही बना कलम का सिपाही

बन्दूक का सिपाही बना कलम का सिपाही




अशोक बंसल



देश में शासन-प्रशासन की दुर्व्यवस्था और जन प्रतिनिधियों के अनाचारों पर यदि एक साधारण पुलिसकर्मी कलम चलाए तो हैरत तो होगी ही। पुलिसकर्मी सुरेश चाहर ने ऐसा ही किया है। मथुरा में सिपाही से सबइंस्पेक्टर बना सुरेश हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत में एम.ए. है और पिछले दिनों हिन्दी में पीएचडी कर उसने अपनी अध्ययनशीलता का परिचय दिया है। हैरत इस बात की भी है कि एक हाथ में बन्दूक और दूसरे में कलम थामने वाले सुरेश की पीठ थपथपाने वाला कोई नहीं।



आगरा जिले की किरावली तहसील के 38 साल के सुरेश ने बताया कि किसान का बेटा होने के कारण उसने 1992 में पुलिस में सिपाही की नौकरी शुरू की। उसे बचपन से पढ़ने लिखने का शौक था। मथुरा में विभिन्न स्थानों पर सिपाही के रूप में तैनात रहते उसने अध्यापकों से संपर्क रखा और हिन्दी अंग्रेजी, संस्कृत में एम.ए. की परीक्षा देता रहा और पास होता रहा। सुरेश ने बताया कि मथुरा के के.आर.डिग्री कॉलेज के हिन्दी के प्रो0 रमाशंकर पाण्डेय और डॉ.अनिल गहलौत की प्रेरणा से उसने पी.एच.डी डिग्री के लिए काम शुरू किया। तीन वर्ष में वह सुरेश से डॉ0 सुरेश हो गया।



हिन्दी में प्रेमचन्द और अंग्रेजी में मिल्टन को पसन्द करने वाले सिपाही सुरेश ने बताया कि उसे पढ़ने लिखने का शौक अवश्य है लेकिन अपनी नौकरी में कभी कोई लापरवाही नहीं बरती। यह बात अलग है कि पुलिस की नौकरी में उसे दिलचस्पी नहीं और वह किसी कॉलेज में प्रोफेसर बन अध्ययन-अध्यापन में लगना चाहता है।



सुरेश अपनी विभागीय परीक्षा पासकर अब सबइन्सपेक्टर है और तैनाती पड़ोसी जिला हाथरस कोतवाली में है। उसने बातया कि पुलिस की नौकरी में रहते उसे जीवन और समाज को जानने का अच्छा मौका मिला है। इसका सदुपयोग उसने ‘तपस्या’ उपन्यास लिखकर किया है। सुरेश के गुरू मथुरा के.आर. कालेज के प्रोफेसर अनिल गहलौत ने बताया कि सुरेश उनके संपर्क में काफी अरसे से है। साहित्य के प्रति एक सिपाही का अनुराग देख कर वह खुद अचम्भे में हैं। ‘तपस्या’ उपन्यास उसकी लगन और ईमानदार सोच का नमूना है। डा0 अनिल ने बताया कि पिछले दिनों उनका प्रोफेसर मित्र छठे बेतन आयोग के लागू होने पर एरिअर के रूप में अच्छी रकम मिलने पर रिवाल्वर खरीदकर लाया था जबकि सुरेश अपना पहला वेतन मिलने पर दौड़ा-दौड़ा पुस्तक की दुकान पर गया और उसने प्रेमचन्द का गोदान खरीदा था।



अपनी उपलब्धियों पर मौन रहने वाले सुरेश ने बताया कि पुलिस विभाग और उसमें काम करने वाले छोटे-बड़े अधिकारी समाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। शोषित-पीड़ित को न्याय दिलाने में उनकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। दुःख तो इस बात का है कि पुलिस वाले अपने आपको पहचानने में भूलकर बैठे हैं बिलकुल वैसे जैसे जनता द्वारा चुने गये नेता।

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