Wednesday, August 3, 2011

मेलबर्न-७,नेड केलि की कथा निराली है

मेलबर्न --७ ,नेड केली की कथा निराली है. आप आस्ट्रलिया आयें और नेड केली की रोचक कहानी सुनें बिना चले जाएँ ,यह संभव नहीं .अंग्रेजी सत्ता को चुनोती देने के जुर्म में २५ साल के आयरिश नोजवान नेड keli को सन १८८० में अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी पर लटका दिया था .मेलबर्न की ओल्ड जेल(आज मूजियम) की कालकोठरी और उस स्थान को देखकर में हेरत में पड़ गया जहां नेड को आनन् फानन में फाँसी दी गयी .आस्ट्रेलिया के मंझे हुए कलाकारों द्वारा एक घंटे के नाटक का मंचन देखकर में मंत्रमुघ हो गया. यह नाटक नेड की जिन्दगी पर फांसी स्थल पर होता है.मजेदार बात यह है की नेड की जिन्दगी में जिसने भी जानने की कोशीश की वह बहता ही चला गया.इतिहासकार, शिक्षाविद, समाज सुधारक ,उपन्यासकार ,फिल्मनिर्माता ,कवि,लेखक ,पत्रकार,लोकगायक ही नहीं आस्ट्रेलिया की सामान्य जनता ने नेड के गीत गए हैं.आस्ट्रेलिया की पुलिस रहस्य रोमांच से भरपूर नेड की जिन्दगी के कुछ अनसुलझे पहलुओं को आज भी सुलझाने की कोशिश करती रहती है. जून १८५५ में जन्मे नेड के पिता रेड केली आयरलेंड से एक केदी के रूप में आस्ट्रेलिया लाये गए थे. सजा काटने के बाद केली परिवार यही बस गया. १२ भाई बहिनों में नेड सबसे बड़ा था .१२ वर्ष की उम्र में नेड ने देखा की विक्टोरिया पुलिस ने उसके परिवार को कभी भी चेन से सांस नहीं लेने दी. अबोध बच्चों के साथ उसकी माँ को तो कभी उसको जेल में डाल देना पुलिस की आदत बन गयी .१४ वर्ष की उम्र में नेड बाग़ी हो गया. ४ हमउम्र दोस्तों के साथ मिलकर वह अंग्रेजी हुकूमत को मजा चखाने बगाबत की राह पर चलने लगा.हथियार थाम और घोड़ो पर सवार ४ नोजवानों का केली गेंग जब जंगलों से अत्याचारी सत्ता के खिलाफ हुंकार भरता था तो पुलिसवालों की रूह कांप जाती थी. केली गेंग को पैसों की जब भी आवशयकता होती वे बेंक लूटते किसी राहगीर को नहीं...सन १९७८ में केली के नाम से सरकार थर थर कांपने लगी.१०० पौंड का इनाम रखा केली के सर पर.एक बार ४ पुलिस वालों ने केली को घेर लिया.इनमें ३ पुलिस वाले गेंग की गोलिओं से मारे गए. एक भाग निकला.इस घटना के बाद केली की गिरफ्तारी पर इनाम २०० पौंड कर दिया गया. बाद में यह इनाम ८००० पौंड तक पहुच गया .इंग्लेंड और आस्ट्रेलिया में किसी अपराधी को पकड़ने के लिए इतना बड़ा इनाम आज तक घोषित नहीं किया गया . केली गेंग के चारों सदस्य लोहे का कवच पहनते थे .इस पर गोली असर नहीं करती थी. इस कबच में खेत जोतने वाले हल का लोहा प्रयोग किया गया था .सर से लेकर पेरों तक का ४० किलो वजन का कवच किस तकनीक से बनाया गया,केली के दिमाग में कवच की परिकल्पना केसे आई और इसे केसे अंजाम दिया आदि सवाल १२५ साल बाद भी केली पर शोध करने वालों को परेशान किये हुए हैं. गाँव वाले केलि से भरपूर सहानभूति रखते थे.केलि ने ५७ पेज (करीब ८००० शब्द) का एक पत्र लिखा और इसे अखबार में प्रकाशित करने के लिए एक व्यक्ति को दिया.इसकी एक प्रति विक्टोरिया संसद को भेजी.इस पत्र को तब दवा दिया गया.१९३० में यानी केलि को म्रत्यु दंड दिए जाने के ५० साल बाद यह पत्र अखबार में छपने के बाद उजागर हुआ. इस पत्र में केलि ने अपने बागी बनने की पूरी कथा तथा अपने परिवार पर किये गए पुलिसिया जुल्म लिखने के साथ साथ शोषित और गरीबों पर ब्रटिश हुकूमत द्वारा किये जाने वाले अन्याय की तस्वीर है.केलि के इस पत्र और भारत के शहीद भगत सिंह द्वारा अदालत में दिए गए बयानों में मुझे समानता मिलती है. यह एक संयोग है.केलि ने पुलिस के हाथों कभी न पकडे जाने की व्यवस्था अपने कबच के माध्यम से कर रखी थी.लेकिन विधि को यह मंजूर न था.बात २६ जून १८८० की है.मेलबर्न से १८० की.मी. दूर ग्लेंरोवन नाम का गाँव है. केलि ने इस गाँव के ७० लोगों को अचानक बंधक बनाया.उसकी योजना थी की इस खबर को सुन मेलबर्न से पुलिस फोर्स ट्रेन से आयेगी. वह रास्ते में पटरी उखाड कर ट्रेन को पलटने की व्यवस्था कर देगा.बंधकों में एक स्कूल मास्टर भी था. किसी तरह वह भाग निकला और ट्रेन को पलटने से बचा लिया. पुलिस ने उस होटल को घेर लिया जिसमे केलि बंधको के साथ था. दोनों ओर से गोलीवारी हुई. केलि अपने कवच पर गोलिओं के वार झेलता रहा.लेकिन एक गोली उसके पैर में लगी और वह गिर पडा और पकड़ा गया/.बाकी तीन साथी मारे गए. मुकदमा चला और आनन् फानन में ११ नव.१८८० को केलि को ओल्ड जेल में फँसी पर लटका दिया गया. केलि को फांसी न देने की अपील ३०००० गाँव वालों ने की. फांसी की सजा सुनाने वाले जज रेडमंड बेरी ने जब केलि से अंतिम इच्छा पूंछी तो केलि ने बड़ी सहजता से कहा की वह जहां जा रहा है वहां आपसे (जज) जल्द ही मुलाक़ात होगी.यह संयोग था की जज बेरी १२ दिन बाद अपने चेंबर में चल बसे. केलि की कहानी का एक आश्चर्यजनक पह्लू यह है की जज बेरी ने ओल्ड जेल के पास एक लाइब्रेरी की स्थापना की थी. आज यह लाइब्रेरी दुनिया की मानी हुई लाइब्रेरी है. इस स्टेट लाइब्रेरी में आज केलि की स्मृति रक्षा बहुत सम्मान के साथ की जा रही है .एक गेलरी केलि को समर्पित है. इसमें केलि का रक्षा कवच और केलि को अमरत्व प्रदान करने वाला उसका पत्र अनेक चित्रों के साथ बड़े सम्मान के साथ प्रदर्शित है .केलि की बहादुरी ब्रिटिश सत्ता को जबरदस्त चुनोती थी .केलि किस मिटटी का बना था, इस रहस्य को जानने के लिए पुलिसवालों ने फांसी के फंदे से केलि के मृत शारीर को उतारा और उसका सर कलम कर चिकित्सकों से जांच कराइ की इसके अन्दर कोई चीज विशिष्ट तो नहीं. बाद में पुलिस अफसर केलि की खोपड़ी का इस्तेमालअपनी मेज पर एक पेपरवेट के रूप में भी करते रहे.अपनी निजी लड़ाई जब jantaa की लड़ाई बन जाय तो लड़ने वाला योध्दा जननायक बन जाता है . यही हुआ केलि केसाथ. जिस स्थान पर केलि को फासी दी गयी उस स्थान पर उसके जीवन पर नाटक खेले जा रहे है ,जिस कालकोठरी में रहा वह संग्रहालय है,जिस मिटटी में उसने पुलिस के साथ लुकाछिपी की वहां लोकगायक उसकी बहादुरी के गीत गा रहे हैं. सम्पूर्ण आस्ट्रेलिया के विश्व विधालयों में केलि के संघर्ष के पीछे छिपे जनहित के मर्म को तलाशने की कोशिश की जा रही है गोष्ठियों और सेमीनार के जरिये केलि के जाने के सवा सो साल बाद भी. .मेलबर्न --७ ,नेड केली की कथा निराली है. आप आस्ट्रलिया आयें और नेड केली की रोचक कहानी सुनें बिना चले जाएँ ,यह संभव नहीं .अंग्रेजी सत्ता को चुनोती देने के जुर्म में २५ साल के आयरिश नोजवान नेड keli को सन १८८० में अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी पर लटका दिया था .मेलबर्न की ओल्ड जेल(आज मूजियम) की कालकोठरी और उस स्थान को देखकर में हेरत में पड़ गया जहां नेड को आनन् फानन में फाँसी दी गयी .आस्ट्रेलिया के मंझे हुए कलाकारों द्वारा एक घंटे के नाटक का मंचन देखकर में मंत्रमुघ हो गया. यह नाटक नेड की जिन्दगी पर फांसी स्थल पर होता है.मजेदार बात यह है की नेड की जिन्दगी में जिसने भी जानने की कोशीश की वह बहता ही चला गया.इतिहासकार, शिक्षाविद, समाज सुधारक ,उपन्यासकार ,फिल्मनिर्माता ,कवि,लेखक ,पत्रकार,लोकगायक ही नहीं आस्ट्रेलिया की सामान्य जनता ने नेड के गीत गए हैं.आस्ट्रेलिया की पुलिस रहस्य रोमांच से भरपूर नेड की जिन्दगी के कुछ अनसुलझे पहलुओं को आज भी सुलझाने की कोशिश करती रहती है. जून १८५५ में जन्मे नेड के पिता रेड केली आयरलेंड से एक केदी के रूप में आस्ट्रेलिया लाये गए थे. सजा काटने के बाद केली परिवार यही बस गया. १२ भाई बहिनों में नेड सबसे बड़ा था .१२ वर्ष की उम्र में नेड ने देखा की विक्टोरिया पुलिस ने उसके परिवार को कभी भी चेन से सांस नहीं लेने दी. अबोध बच्चों के साथ उसकी माँ को तो कभी उसको जेल में डाल देना पुलिस की आदत बन गयी .१४ वर्ष की उम्र में नेड बाग़ी हो गया. ४ हमउम्र दोस्तों के साथ मिलकर वह अंग्रेजी हुकूमत को मजा चखाने बगाबत की राह पर चलने लगा.हथियार थाम और घोड़ो पर सवार ४ नोजवानों का केली गेंग जब जंगलों से अत्याचारी सत्ता के खिलाफ हुंकार भरता था तो पुलिसवालों की रूह कांप जाती थी. केली गेंग को पैसों की जब भी आवशयकता होती वे बेंक लूटते किसी राहगीर को नहीं...सन १९७८ में केली के नाम से सरकार थर थर कांपने लगी.१०० पौंड का इनाम रखा केली के सर पर.एक बार ४ पुलिस वालों ने केली को घेर लिया.इनमें ३ पुलिस वाले गेंग की गोलिओं से मारे गए. एक भाग निकला.इस घटना के बाद केली की गिरफ्तारी पर इनाम २०० पौंड कर दिया गया. बाद में यह इनाम ८००० पौंड तक पहुच गया .इंग्लेंड और आस्ट्रेलिया में किसी अपराधी को पकड़ने के लिए इतना बड़ा इनाम आज तक घोषित नहीं किया गया . केली गेंग के चारों सदस्य लोहे का कवच पहनते थे .इस पर गोली असर नहीं करती थी. इस कबच में खेत जोतने वाले हल का लोहा प्रयोग किया गया था .सर से लेकर पेरों तक का ४० किलो वजन का कवच किस तकनीक से बनाया गया,केली के दिमाग में कवच की परिकल्पना केसे आई और इसे केसे अंजाम दिया आदि सवाल १२५ साल बाद भी केली पर शोध करने वालों को परेशान किये हुए हैं. गाँव वाले केलि से भरपूर सहानभूति रखते थे.केलि ने ५७ पेज (करीब ८००० शब्द) का एक पत्र लिखा और इसे अखबार में प्रकाशित करने के लिए एक व्यक्ति को दिया.इसकी एक प्रति विक्टोरिया संसद को भेजी.इस पत्र को तब दवा दिया गया.१९३० में यानी केलि को म्रत्यु दंड दिए जाने के ५० साल बाद यह पत्र अखबार में छपने के बाद उजागर हुआ. इस पत्र में केलि ने अपने बागी बनने की पूरी कथा तथा अपने परिवार पर किये गए पुलिसिया जुल्म लिखने के साथ साथ शोषित और गरीबों पर ब्रटिश हुकूमत द्वारा किये जाने वाले अन्याय की तस्वीर है.केलि के इस पत्र और भारत के शहीद भगत सिंह द्वारा अदालत में दिए गए बयानों में मुझे समानता मिलती है. यह एक संयोग है.केलि ने पुलिस के हाथों कभी न पकडे जाने की व्यवस्था अपने कबच के माध्यम से कर रखी थी.लेकिन विधि को यह मंजूर न था.बात २६ जून १८८० की है.मेलबर्न से १८० की.मी. दूर ग्लेंरोवन नाम का गाँव है. केलि ने इस गाँव के ७० लोगों को अचानक बंधक बनाया.उसकी योजना थी की इस खबर को सुन मेलबर्न से पुलिस फोर्स ट्रेन से आयेगी. वह रास्ते में पटरी उखाड कर ट्रेन को पलटने की व्यवस्था कर देगा.बंधकों में एक स्कूल मास्टर भी था. किसी तरह वह भाग निकला और ट्रेन को पलटने से बचा लिया. पुलिस ने उस होटल को घेर लिया जिसमे केलि बंधको के साथ था. दोनों ओर से गोलीवारी हुई. केलि अपने कवच पर गोलिओं के वार झेलता रहा.लेकिन एक गोली उसके पैर में लगी और वह गिर पडा और पकड़ा गया/.बाकी तीन साथी मारे गए. मुकदमा चला और आनन् फानन में ११ नव.१८८० को केलि को ओल्ड जेल में फँसी पर लटका दिया गया. केलि को फांसी न देने की अपील ३०००० गाँव वालों ने की. फांसी की सजा सुनाने वाले जज रेडमंड बेरी ने जब केलि से अंतिम इच्छा पूंछी तो केलि ने बड़ी सहजता से कहा की वह जहां जा रहा है वहां आपसे (जज) जल्द ही मुलाक़ात होगी.यह संयोग था की जज बेरी १२ दिन बाद अपने चेंबर में चल बसे. केलि की कहानी का एक आश्चर्यजनक पह्लू यह है की जज बेरी ने ओल्ड जेल के पास एक लाइब्रेरी की स्थापना की थी. आज यह लाइब्रेरी दुनिया की मानी हुई लाइब्रेरी है. इस स्टेट लाइब्रेरी में आज केलि की स्मृति रक्षा बहुत सम्मान के साथ की जा रही है .एक गेलरी केलि को समर्पित है. इसमें केलि का रक्षा कवच और केलि को अमरत्व प्रदान करने वाला उसका पत्र अनेक चित्रों के साथ बड़े सम्मान के साथ प्रदर्शित है .केलि की बहादुरी ब्रिटिश सत्ता को जबरदस्त चुनोती थी .केलि किस मिटटी का बना था, इस रहस्य को जानने के लिए पुलिसवालों ने फांसी के फंदे से केलि के मृत शारीर को उतारा और उसका सर कलम कर चिकित्सकों से जांच कराइ की इसके अन्दर कोई चीज विशिष्ट तो नहीं. बाद में पुलिस अफसर केलि की खोपड़ी का इस्तेमालअपनी मेज पर एक पेपरवेट के रूप में भी करते रहे.अपनी निजी लड़ाई जब jantaa की लड़ाई बन जाय तो लड़ने वाला योध्दा जननायक बन जाता है . यही हुआ केलि केसाथ. जिस स्थान पर केलि को फासी दी गयी उस स्थान पर उसके जीवन पर नाटक खेले जा रहे है ,जिस कालकोठरी में रहा वह संग्रहालय है,जिस मिटटी में उसने पुलिस के साथ लुकाछिपी की वहां लोकगायक उसकी बहादुरी के गीत गा रहे हैं. सम्पूर्ण आस्ट्रेलिया के विश्व विधालयों में केलि के संघर्ष के पीछे छिपे जनहित के मर्म को तलाशने की कोशिश की जा रही है गोष्ठियों और सेमीनार के जरिये केलि के जाने के सवा सो साल बाद भी. .v
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Sunday, July 31, 2011

Melbourne --6

मेलबर्न --६ ,परदेश में हिंदी की जंग ने देश में राष्ट्रीय भाषा होते हुए भी हिंदी को अपनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है. यह हेरत की बात है लेकिन खुशी की नहीं .पर मेलबर्न में हिंदी की लड़ाई की खबर सुन मुझे हेरत भी हुई और खुशी भी.पैसा ,सेहत और सम्मान की खोज में भारतीय विदेश में बस रहे है. प्रतिभा और लगन इसे लोगों की मदद कर रही है .विदेश में बसने के 10-१५ वर्ष निकलने पर सब को अपनों की याद सताती है . शुरू के साल शानदार जीवन जीने में निकल जाते हैं. लेकिन सब कुछ पाने के बाद अचनक दुनिया सुनी सुनी सी लगती है और यादें पीछा करती हैं. इस बात का आभाष मुझे मेलबर्न में बसे भारतीयों से बात करने के बाद हुआ.
वतन के प्रति निष्ठा एक भले इंसान में जीवन परियन्त रहती है.वतन से दूर रहकर यह निष्ठा और मजबूत होती है.धीरे धीरे यह निष्ठा उसका बल बनती है. मेलबर्न के भारतीय अपने देश पर आई विपिदा के लिए मदद के हाथ हमेशा बढ़ाते रहे है. यही हाल भाषा के प्रति उनकी ममता का है.कई भारतियों ने काव्य संध्या के बहाने आपस में एकदूसरे की लिखी कविताओं को सुनाने का सिलसिला शुरू किया है.लखनऊ के दिनेश मोहन श्रीवास्तव हिंदी पुष्प नाम से मासिक पत्र निकालतेहैं.बेरोवी मेलबर्न से ३० किलोमीटर दूर सवा लाख लोगो का
उपनगर है. यहाँ रहने वाले अनिल शर्मा इंडिया एट मेलबर्न नाम से साप्ताहिक पत्र निकालते हैं .मेरे एक फ़ोन पर मुलाक़ात के लिए तेयार हो गए .सुभाष शर्मा अलीगढ के है. ३० साल से है. हिंदी की कविता करते हैं और हिंदी प्रेमिओं को एक सूत्र में बाँध रखा है .ये लोग हिंदी की लड़ाई मेलबर्न में लड़ रहे हैं.इन लोगों ने स्कूलों में हिन्दी भाषा को पाट्यक्रम में शामिल करने की जंग छेड़ रखी है.विक्टोरिया सरकार ने एक स्तर पर बात मानते हुए कुछ स्कूलों में इसे पढाना शुरू तो कर दिया है लेकिन हिंदी को रास्ट्रीय पाठयक्रम में शामिल करने की मांग ये लोग बनाए हुए हैं .जिस देश में हिंदी का नामोनिशान न हो वहां कुछ कंठ हिंदी जाप करें ,यह जानकारी १२००० की.मी. दूर मेरा कलेजा चोडा करने वाली है.
अप

Friday, July 29, 2011

मेलबर्न--५, अछा है तो सीखना होगा

मेलबर्न--५,   अछा है तो सीखना होगा
सवा दो करोड़ की आबादी वाला आस्ट्रेलिया सभी को भा रहा है..अपनों की कमी झेलने वाले भी मोका मिलते ही इसकी तारीफ में बह जाते हैं. यहाँ आदमी अपने टेलेंट को उभ़ार सकता है.यह बात एक टेक्सी ड्राईवर और उसकी बीबी की है.उनका कहना है की पिछले ११ साल में उन्हें इस देश से कोई शिकायत नहीं. इस देश में अनेक चीजें  yesi   है जिन्हें सीखा जा सकता है.
आस्ट्रेलिया का इतिहास ३ सो सालों से कम का है .इस इतिहास का प्रदर्शन करने में सरकार की मेहनत साफ झलकती है.१७७८ में अन्रेजों ने यहाँ कदम रख्खा . खूब मारकाट की .इस धरती के इतिहास के काले पन्ने को  मेलबर्न के कई मूजियम में शानदार और ईमानदारी से दर्शाया गया है.मेलबर्न में रुकने का यही तो मजा है की यहाँ के मूजियम और लाब्रेरारी का भ्रमण  करने में आनद की अनुभूति होती  है. स्टेट लाब्रेररी में पुस्तके ही नहीं वरन यहाँ की कई गेलरी किसी मूजियम से कम नही.मूजियम में दर्शकों को केसे आकर्षित किया जाता है ,कलाक्रतिओं को केसे प्रदर्शित किया जाना चाहिए यह सब य्याहान से शिखा जाना चाहिए.१८ वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में मेलबर्न की पुरानी जेल भी मूजियम सरीखी है इस जेल की एक  कालकोठरी में फतेहचंद ऑफ इंडिया लिखा मिला. इस भारतीय ने यहाँ किसी का maar     डाला था   किया था और फासी की सजा पाई थी. इसी जेल में मुझे नेड केली के बारे में जानने का मोका मिला. २३ साल के इस आयरिश लड़के को १८८० में फांसी पर लटकाया गया. इसने अग्रेजी हुकूमत को ४ दोस्तों के साथ मिलकर जबरदस्त चुनोती दी थी. नेड पर ६-७ फिल्में बन चुकी हैं.नेड पर अलग आलेख बन सकता है. 
मेलबर्न में २३३ देशों के लोग बसे है. भारतीयों की रुची दिनप्रतिदिन  बढ रही है. आस्ट्रलिया का अतीत और वर्तमान किसी फिल्मी कहानी से कम रोचक नहीं.यंहा की सरकार इस रोचकता को बढाने में किसी मायने  में कम नही. अच्छी बातों को तो सीखा  जा सकता है. 
 

 
 
 

Tuesday, July 26, 2011

Melbourne ----3


परदेश तो परदेश है.
 इंसान ने जब से आँखें खोली है वह जीवन को बेहतर और बेहतर बनाने की दिशा में संघर्षरत है.यूरोप ,अमेरिका और आस्ट्रेलिया एशिया के बाशिंदों को सदेव से आकर्षित करते रहे है.साधन संपन्न लोग अपने बच्चों को विदेश भेजकर अपने लोगो में विशिष्ट दर्जा प्राप्त करते रहे है. गांधी नेहरु के वक्त में परदेश जाना बहुत मुश्किल था. आजकल अपेक्षाकृत सरल है. इसी कारण में बार बार मेलबर्न आ जाता हूँ. अपने हर प्रवास में में मेलबर्न की सड़कों को नापता हूँ ,यहाँ के म्यूजियम को निहारता हूँ ,गोरे और उनकी मेमो-बच्चों की जीवन शेली को जानने की कोशिश करता हूँ .साथ ही कल्पना करता हूँ की यह सब वातावरण हमारे देश में हमारी सरकारे क्यों नहीं दे पाती? ६ दशक से अधिक निकल गए देश को आजाद हुए.
\ जुलाई के मध्य में में जब यहाँ आया तब अपने यहाँ बाबा रामदेव,अन्ना हजारे, सुरेश कल्मारी ,और यु पी में चुनाव की तेयार करती राजनीतिक पार्टियों और राजनीत को व्यपार समझने वाले नेताओं को छोड़कर आया था. इन्ही की चर्चाएँ अखबारों की सुर्खियाँ थीं.
यहाँ. आकर मुझे अजीब सा लगा.मेलबर्न में सब कुछ शांत.टंड जरूर पर सुखद .सड़कें साफसुथरी.और इन पर तेज तेज कदमों से अपने अपने काम पर जाते लोग.जेसे दिल्ली का कनाट प्लेस वेसी ही भीड़ भाड मेलबर्न के फेडरेशन स्कायर पर मिलेगी .यह स्थान मोज मस्ती और सांस्कृतिक गतिविधिओं का अदभुत केंद्र है .ऐसा नहीं सरकार के पास समस्याएं नहीं .मजेदार और सुखद बात यह है की सरकार जनता की मांग उठने से पहले जनता की असुविधाओं पर ध्यान देना शुरू कर देती है.में विक्टोरिया पार्लियामेंट में एक घंटे का प्रश्न काल में गया था. पानी ,बिजली और शिक्षा ,ट्रेफिक आदि मुद्दों चर्चा के दोरान सदस्यों की हास्य और व्यंगात्मक शेली से संसद गूंज रही थी .नेहरु के युग में. हमारे यहाँ ऐसा होता था. एस सन्दर्भ में तरकेशारी सिन्हा का नाम याद किया जा सकता है. लेकिन अब यह सपना है.पुस्तकालय  और समुदायक स्वास्थ्य केन्द्रों पर सरकार का ध्यान पूरा पूरा है .इन जगहों पर जाकर तबियत खुश हो जाती है.इलाज और दवाएं चाहे कितनी आधुनिक और बिना मिलावट के क्यों न हो यहाँ बीमार होने पर अपने वतन की याद रह रह कर आती है.बीमार व्यक्ति को डाक्टर से वक्त लेने में १५-१५ दिन इन्तजार करना पड़ता है. चिकितसकों तथा नर्सों  की कमी  है. सरकार इन्हें बसाने में वरीयता दे रही है.
गत वर्ष मेलबर्न में हुए नस्ली हमलों ने भारतियों को हिला दिया. यहाँ आने वाले भारतीय छात्रों की सखा में गिरावट आ गयी.सरकार की विशव स्तरपर छवि धूमिल हुई,साथ ही अर्थ व्यवस्था पर असर पड़ा.  परिणामस्वरूप सरकार ने सख्त कदम उठाय और गोरे हमलावरों पर लगाम लगाईं.
मेरी मुलाक़ात  बहुत से भारतीयों से हुई .कोई १० साल से है तो कोई २-३ सालों से. यहाँ की साफ सुथरी जिन्दगी से  सब खुश हैं.जीवन स्तर अछा है लेकिन पूरी जिन्दगी बसने के नाम पर हिचकी लेते नजर आते है. अपनी अपनी  जुबान में कहते  है की अपनों की याद आती  है.कुछ दिनों काम कर लें फिर वापस तो जाना ही है.गोरे शिष्टाचार में किसी से कम नहीं  पर इनके मन में क्या है नहीं मालुम .चाहे पी .आर  ले लो या सिटिजनशिप परदेश तो परदेश है.

Thursday, July 21, 2011

मेलबर्न आजकल ---२

गोरे काले का भेद तो है
 साफ सुथरी हवा,पानी,मौज मस्ती के बेहिसाब साधन घुमने  फिरने की बेहिसाब जगह, प्रदुषण नाम की चीज नहीं,मिलावट और भ्रटाचार का नामोनिशान नहीं ,मंत्री और अफसरों की बेईमानी के किस्से  नहीं.यह सब मेलबर्न की धरती पर दिखाई दे रहा है --हर क्षण .लेकिन एक जहर ऐसा है जो घुला हुआ है इस शानदार धरती की गोरी चमड़ी में .रंगभेद नाम का यह जहर मेरे अंदर दहशत पैदा कर चुका है. सन २००९ में ऐसा नहीं था जब में दिसम्बर माह में मेलबर्न की सड़कों पर बेखोफ -बेझिझक  पैदल या ट्राम में घूमता था. पिछले साल इन्ही सडकों पर घटी नस्ली घटनायों ने सोचने पर मजबूर किया है की  रहने के लिए दुनिया के  शानदार शहरों में शुमार ही नहीं बल्कि अब्बल आने वाले मेलबर्न शहर में यूरोप की तरह रंगभेद के गुबार क्यों  उठने लगे हैं ?क्या यह बात सही है?
मेरा उत्तर हाँ है और इसी कारण में अपने १ माह के मेलबर्न प्रवास में समुचित सावधानी बरत रहा हूँ .
गोरों के अंदर मौजूद चमड़ी भेद मुझ जेसे इंसान में ही नहीं यहाँ की सरकार और अन्य स्वतन्त्र संस्थायों को भी चितित किये है. मेलबर्न रेडिओ  स्टेशन जिसे एस बी एस के नाम से जाना जाता है ने एक सर्वे कराया है की यहाँ वास्तव में रंगभेद   है या नहीं? आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवेर्सिटी भी इस विषय पर काम कर रही है.  यही पर मिली एक जानकारी के मुताविक एक गोरे छात्र को १० स्थानों पर आवेदन करने पर नोकरी मिल जाती है जब की एशियन को नोकरी के लिए १६ स्थानों पर आवेदन करना पड़ता है.
पिछले साल भारतीय समुदाय के लोगों के साथ यहाँ जो कुछ हुआ हम सब चिंतित हुए, यहाँ की सरकार भी. सरकार द्वारा की गयी सक्ती के बाद
यहाँ बसे भारतियों में फिर से खुली हवा में सांस लेने की हिम्मत जगी है. पॉइंट कुक जहां मुझे १ मiह रहना है ,में कई  भारतीय मिले जो यहाँ की नागरिकता के लिए आवेदन करने की सोच रहे हैं.मेरे जेसे उम्रदराज के लिए यहाँ बसने का सोच मन को नहीं भाता पर जिंदगी की शुरुआत करने वाले नोजवान के लिए यहाँ बसने का विचार बुरा नहीं.
और रही बात रंगभेद और फिर फिर होने वाले नस्ली हमलो की, इन्हे पूरी तरह समात करना किसी सरकार के बूते की बात नहीं. इतिहास  बताता है सन १७७८ में यूरोपियनओं  ने आस्ट्रेलिया की धरती पर कदम रखा ,तब से वे इस रंगभेद  की बुराई से ग्रसित है.
हम भारतियों को यहाँ से पलायन करके नहीं बल्कि यहाँ जमे रहकर रंगभेद के खिलाफ  वातावरन बनाना होगा तभी हम  अपने देश का नाम रोशन कर सकते हैं. ..

मेलबर्न आजकल

मेलबर्न आजकल
 
 मेलबर्न से २५ किलोमीटर दूर बसे उपनगर पॉइंट कुक में डेरा डाले मुझे लगता है की यहाँ  सरकार और जनता एकदूसरे के पूरक है.दोनों में किसी बात का कोई टकराव नहीं. सरकार जीवन को बेहतर बनाने में लगी   है तो तेज कदमो से सड़कें नापते गोरे काले सभी सरकार के बनाए कायदे कानूनों का पालन करने में मगन हैं .
डेड से तीन करोड़ रू.  की लागत वाले वातानुकूलित  मकान और शानदार बाजार  देखकर मन में विचार आता है की हमारे देश के गाँव की ज़मीन सुनिओजित शहर विकसित क्यों नहीं कर पाती? गावों के लोग शहर की ओर क्यों पलायन कर रहे हैं? यहाँ ऐसा नहीं.  शहर की हर सुविधा यहाँ है तो कोन मेलबर्न शहर के मल्टीस्टोरी इमारतों में रहेगा? रेल,बस, कोलोनाजेशन सब कुछ प्राइवेट लेकिन सरकार के बनाए कानूनों के तहत. इन कानूनों
 का पालन कराने में सरकार की इच्छा शक्ति और ईमानदारी साफ़ झलकती है.ऐसा नहीं की शरारती और अपराधी किस्म के लोग यहाँ हे ही नहीं .ये अपराधी लोग सरकारी डंडे से जरूर डरते होंगे तभी पॉइंट कुक  जेसे दर्जनों उपनगरों में लकड़ी और काच के बने मकानों में लोग बेखोफ रह  रहे हैं. 
पॉइंट कुक की आबादी २५ हजार  से अधिक नहीं.  फिर भी माल्नुमा संस्कृति से लेस   बाजार में सरकारी  लाब्रेरी है ,पूरी तरह आधुनिक.इस लाब्रेरी में हिंदी की एक अलमारी देखकर मन प्रफुलित हुआ .गिरिराजकिशोर और पुष्पा मैत्री की किताबों  को छूकर देखा. मालूम करने पर पता चला की इस इलाके में हिंदी पाठकों की संखा अच्छी खासी है. सन २०३० में सरकार ने इस उपनगर की आबादी ५० हजार से ज्यादा करने की ठानी  है.  
अमन चेन और प्रदुषण मुक्त  इस उपनगर के माल में यह देखकर अचरज हुआ की हर भारतीय दूसरे लोगों की तरह हर कायदे क़ानून को  अपना रहा था लेकिन अपने देश में इसी भारतीय को क़ानून को टेंगा दिखाने में मजा आता  है.बंद करता हूँ यह कहकर .......जेसा देश वेसा भेष
 
    
 
 
 
   

Saturday, May 7, 2011

अन्ना मुझे माफ करना

अशोेक बंसल
जन्तर मन्तर पर धरने पर बैठे अन्ना को देखने-सुनने प्रो0 मनसुखलाल भी गए थे। उनके कलेजे में बरसों से दबी-बैठी नैतिकताओ में उबाल आ गया। कई प्रण एक साथ किए। एक भी क्लास नहीं छोेड़ेंगे। उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन ईमानदारी से करेंगे। सामाजिक जीवन में पुराने सिद्धान्त ‘न घूस लो न घूस दा’े पर चलेंगे। इसी उधेड़बुन में मनसुळलाल दिल्ली स्टेशन पहुंचे तो आगरा जाने वाली टेªन ने सीटी मार दी। मनसुख भागे। सामने थ्री टियर का डिब्बा था। चढ़ गए।
साधारण टिकिट और डिब्बा रिजर्व/टीसी को आना ही था। काले कोट को देखकर मनसुख की सांसे ऊपर नीचे होनेे लगी। रसीद काटने पर आमादा टीसी से प्रो0 मनसुख ने रिजर्व डिब्बे में चढ़ने की मजबूरियां गिनाई।अध्यापकों पर रहम करने की विनम्र अपील की। घाट घाट का पानी पीने वाला टीसी टस से मस न हुआ। तब मनसुख झुके। फौरन सौ का पत्ता निकाला और टीसी को चलता किया। मनसुख के कलेजे की नैतिकता ने हिचकी ली। बोले ‘अन्ना मुझे माफ करना।’
अगले दिन मनसुख कॉलेज में शिक्षक संघ की बैठक में पहुंचे। डी.ए. के एरियर के बिल को डी.आई.ओ.एस. का बाबू पास करने की एबज में दक्षिणा मांग रहा था। शिक्षकों में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने की मांग उठ रही थी। मनसुख ने जन्तर मन्तर पर बैठे अन्ना को अपनी ताकत बताया। तभी एक शिक्षक ने दुनियादारी का पाठ पढाया ‘‘बाबू बगल के कमरे में है। मात्र 50 रू0 प्रति शिक्षक चन्दा करो। दस हजार रु प्रति शिक्षक का लाभ है। जितनी देर उतनी ब्याज की हानि।’’ इस व्यावहारिक राय पर कई शिक्षकों के मुंह में मानो डाट लग गई। कुछ बड़बड़ाए। आनन फानन में बाबू की रिश्वत का चन्दा हुआ। मनसुख को यादा आया ‘जैसा देश वैसा भेष’’। तत्काल 50 रू0 जेब से निकाले और बुदबुदाए, ‘‘अन्ना मुझे माफ करना।’’
कॉलेज से घर जाते मनसुख को लगा किवह रक्तदान शिविर में टेबिल पर लेटे है और उनकी बांह में ठुंसी सुई में उनके शरीर से खून नहीं उनकी आत्मा के कण निकल रहे हैं। घर पर स्कूटर रोका तो मीटर रीडर मीटर में तांकझांक कर रहा था। बोला ‘सर आपके मीटर से छेड़छाड़ हुई है। सील टूटी है। शिकायत कर रहा हूं, यहां हस्ताक्षर करिए।’ मनसुख ने चाल चली ‘तुम्हे मालूम है अन्ना अनशन पर क्यों बैठे हैं? मीटर रीडर बोला‘ सर! इसीलिए तो अब हर काम कायदे से होगा।’ मनसुख को गान्धी की याद आई। फौरन 5 सौ का नोट निकाला और मीटर रीडर की मुठ्ठी गरम कर दी। मीटर रीडर के मुंह से शिष्टाचारवश निकला ‘नमस्कार’ लेकिन मनसुख के मुख से ‘‘अन्ना मुझे माफ करना’ही निकला ।
मनसुख को एम.एस.सी. गणित की कापियां जांचनी थी। 15 रू0 प्रति कॉपी मिलेगा। सोचा कुछ कापियां निपटा लूं। मनसुख ने लाल कलम थामी और जांचने बैठ गए। पहली काफी के आठ दस पन्न पलटे ही थे कि उनकी नजर कॉपी में लिखी चिट्ठी पर गई। लिखा था-‘ मुझे 75 फीसदी चाहिए। आपकी तबियत खुश कर दूंगा। मेरा मोबाइल नं. .................... है।’’
मनसुख की अंगुलियां मशीन बन गई। झटपट मोबाइल उठाया और छात्र का नम्बर दबा दिया। दूसरे छोर से जैसे ही आवाज आई मनसुख ने साहस बटोरा और बोले ‘तुमने अपनी कॉपी में मोबाइल नम्बर लिखा है’’ छात्र ने स्वीकारा, ‘‘यस सर!’’ आदेश करें। मनसुख ने ऐसे कहा जैसे छात्र पर उनकी रकम पहले से जमा हो............‘दो हजार रु का रिचार्ज कूपन डलवा दो।’ मनसुख ने फोन पटका ही था कि उनके सैल में एसएमएस की घन्टी बजी। सन्देश पढ़ा। लिखा था ‘28 रू. थे। अब 2028 रू0 हैं।’’ मनसुख अपने हुनर  पर मन्दमन्द मुस्काए पर दबी जुबान से एक बार फिर बोले-‘अन्ना मुझे माफ करना।’’
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