Sunday, January 22, 2012


   



 स्वाधीनता संग्राम का असली चरित्र

रतन  लाल बंसल

आज हम अपनी आजादी की वर्षगाँठ मनाने के लिए यहां एकत्रित हुए हैं आज से लगभग 30 वर्ष पूर्व हमारे देश  को इन दिनों ही ब्रिटिश  दासता से मुक्ति प्राप्त हुई थी। यह आजादी हमको अनुदान के रूप में नहीं मिली थी, बल्कि यह उस सतत संघर्ष का परिणाम था, जिसके लिये हमारे देश  के लाखों नर नारियों ने वीरता पूर्वक संघर्ष किया था और सभी प्रकार का त्याग किया था। इस त्याग और बलिदान के पावन इतिहास का एक अध्याय मैं यहां आपके समक्ष प्रस्तुत करने के लिए खड़ा हुआ हूं। यह अध्याय सन् 1857 से लेकर सन् 1900 ई. तक हमारे देश  के जनजागरण और स्वतंत्रता की भावना के उद्दीपन की गाथा है।
भारत में अंग्रेजों की सत्ता के विरूद्ध सबसे बड़ा और सबसे व्यापक विद्रोह सन् 1857 में हुआ जिसे जनसाधारण गदर के नाम से जानता और पुकारता है।
1857 में हुए इस राज्य विप्लव  के विषय में  इतिहासकारों के मध्य आज भी यह विवाद प्रचलित है कि उस भीषण विद्रोह को स्वतंत्रता संग्राम माना जाना चाहिए या नहीं। इस विषय में मेरी विनम्र धारणा यह है कि इस विद्रोह में सभी प्रकार के तत्व सम्मिलित थे।  1857 के विद्रोह के नेताओं में ऐसे लोग भी थे, जो अंग्रेजों द्वारा किये गये कुछ प्रगतिषील सुधारों, जैसे सती प्रथा का उन्मूलन आदि कार्यो से नाराज थे। कुछ ऐसे सामन्त थे जिनके राज अंग्रेजों ने हड़प लिये थे। कुछ ऐसे अराजक तत्व भी थे जो केवल लूटमार का अवसर प्राप्त करने के लिए विद्रोही बन गये थे। लेकिन ऐसे दूरदर्षी और सच्चे देषभक्त भी थे जो भारत पर अंग्रेजों के शासन को राष्ट्रीय सम्मान के विरूद्ध समझते थे। ऐसे लोगों में मुसलमान मौलवियों और विद्वानों का एक दल भी था, जिसने सन् 1803 में ही, जब अंग्रेजों ने दिल्ली पर अधिकार स्थापित किया, अंग्रेजों के विरूद्ध खुलेआम आवाज बुलन्द की थी और मुसलिम जन साधारण को अंग्रेजों के विरूद्ध सशस्त्र युद्ध करने के लिए संगठित करने का प्रयास किया था।
सन् 1857 के विद्रोह के विषय में अभी तक जो सामग्री एकत्रित की जा सकी है उसके अध्ययन से यह बात भी प्रकाश  में आती है कि विद्रोह में भाग लेने वाले कुछ लोग विद्रोह के सफल हो जाने पर भारत में ऐसी राज्य सत्ता स्थापित करने का स्वप्न देख रहे थे जो किसी सीमा तक लोकतंत्र पर आधारित होती l  दिल्ली में विद्रोहियों की जो बार कौंसिल बनाई गई थी उसमें प्रत्येक सैन्य दल से निर्वाचित प्रतिनिधि सदस्य बनाये गये थे। उस पिछड़े हुए जमाने में यह पद्धति कोई साधारण बात नहीं थी।
इसी प्रकार जब लखनऊ जाती हुई अंग्रेजों की एक सेना की छावनी से जब एक भारतीय विद्रोही को गिरफ्तार किया गया, जिसका नाम मुहम्मद अली था और जो उन भारतीयों में से एक था जिन्होंने सबसे पहले रूड़की के कॉलेज में इंजीनियरिंग की  शिक्ष  प्राप्त की थी और जो दो बार इंगलैण्ड हो आया था, तो उसने फाँसी के तख्ते पर चढ़ने से पहले अंग्रेजों की सेना के एक अधिकारी फार्बस मिचैल से कहा था कि यद्यपि हम भारत से अंग्रेजों की सत्ता हटाने में असफल हुए हैं, फिर भी मुझे सन्तोष है कि भारत से ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज समाप्त ने जा रहा है और अब ब्रिटिश  पार्लियामेंट का प्रत्यक्ष शासन भारत पर होगा। इस तरह हम कुछ न कुछ करने में तो सफल हुए ही हैं।
फाँसी के फन्दे को सर से ऊपर झूलते हुए देख कर भी ईस्टइंडिया कम्पनी के शासन की अपेक्षा लोकतंत्रीय पद्धति से चुनी गई पार्लियामेंट के शासन को श्रेष्ठ बताने के हृदय में लोकतंत्र के लिए कितनी निश्ठा रही होगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इसी लिये मेरा निवेदन है कि सन् 1857 के महान् विद्रोह में सभी प्रकार के विचारों के लोग सम्मिलित थे l  यह विद्रोह विदेशी  सत्ता को अपदस्थ करके स्वदेषी सत्ता की स्थापना हेतु किया गया था इसलिये इसे यदि हम स्वतंत्रता के संग्राम की संज्ञा दें तो अनुचित नहीं है।
सन् १८57 के विद्रोह की सबसे अधिक आकर्षक बात मुझे यह लगती है कि इसमें हिन्दू मुसलमानों ने अद्भुत एकता का परिचय दिया था। बिठूर का नाना और झांसी की रानी भी मुगल बादषाह के उसी झंडे के नीचे यह भीषण युद्ध लड़ रहे थे, जिस झंडे के नीचे शामली के मोर्च पर मुसलमान मौलवी अपना खून बहा रहे थे। दिल्ली में मुगल बादषाह बहादुरषाह जफर ने जब बकर ईद के दिन गायों की कुर्बानी पर रोक लगादी और यह ऐलान करा दिया कि अगर कोई गाय की कुर्बानी करेगा तो उसे तोप से उड़ा दिया जायेगा। तो इसका समर्थन बहुत से मौलवियों ने भी किया था। खेद यही कि इस तरह की एकता सन् 1920-21 में हुए खिलाफत और असहयोग आन्दोलन को छोड़कर फिर कभी देखने को नहीं मिली।

सन् 1857 के बाद
सन् 1857 के विद्रोह का दमन अंग्रेजों ने इतनी पाषविकता के साथ किया था कि उसके पशचत् समस्त देश  में भयानक भय व्याप्त हो गया था। लोग आपस में बन्द कमरे के भीतर भी अंग्रेजों की आलोचना करने से डरने लगे थे। इसका एक उदाहरण यह है कि जब महारानी लक्ष्मीबाई ग्वालियर से युद्ध में वीर गति को प्राप्त हुई तो उनके दत्तक पुत्र को जो 10-12 वर्ष का था रानी के स्वामिभक्त सेवक किसी प्रकार ग्वालियर से हटाने में सफल हो गये। इसके पष्चात् इन सेवकों का दल उस मासूम राजकुमार को लेकर दर दर भटकता फिरा किन्तु किसी ने भी उस बालक को आश्रय देना स्वीकार नहीं किया और उसे बहुत लम्बे समय तक जंगलों और पर्वतों में निवास करना पड़ा। मुझे इस राजकुमारी की यह कहानी महारानी लक्ष्मीबाई के प्रपौत्र श्री कृष्णाराव लक्ष्मण राव झांसी वाला से प्राप्त हुई थी जो तीन चार वर्ष पूर्व तक इन्दौर की एक कम्पनी में क्लर्की करते हुए जीवन यापन करते थे। बाद में दादा बनारसीदास जी चतुर्वेदी की कृपा से उनको तीन सौ रूपया मासिक की    पेंशन  भारत सरकार से मिलने लगी थी। अब वे स्वर्गस्थ हो चुके हैं किन्तु उनका परिवार आज भी इन्दौर में है। इस उदाहरण से यह भली भांति समझा जा सकता है कि उस समय कितना आतंक व्याप्त रहा होगा।
लेकिन साहसिक व्यक्तियों का कभी अभाव नहीं होता। जिन लोगों के दिलों  में देश  से अंग्रेजों को बाहर निकालने की आग थी, वह जल्द ही सम्हल गये और इन सम्हलने वालों में सबसे पहले लोग वे मुसलमान मौलवी थे, जिनके निकट अंग्रेजों की सत्ता का विरोध उनका धार्मिक कर्तव्य था। इन लोगों ने फिर अपने को संगठित किया और सहारनपुर के पास देवबन्द जैसे छोटे कस्बे में एक धार्मिक स्कूल की स्थापना करके अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया। इन मौलवियों के ही एक दूसरे दल ने सीमाप्रान्त के कबायली प्रदेश  में स्थित अपने केन्द्र के लिए भारत से जन धन की सहायता करनी प्रारम्भ की और हजारों लोग और लाखों रूपया उस केन्द्र को भेजा जाता रहा। यह लोग उस केन्द्र में पहुंचकर सैनिक  शिक्षा  प्राप्त करते थे और फिर अंग्रेजों की छावनियों पर आक्रमण करते थे। अंग्रेजों ने इस आन्दोलन का उल्लेख बहाबी आन्दोलन के नाम से किया है इस दल के लोगों ने भारत में भी कुछ उच्च अंग्रेज अधिकारियों की हत्या कर दी, जिनके कारण इनका भयानक दमन किया गया। अनेक मुसलिम विद्वान कालापानी भेजे गये और कुछ को फांसी भी दी गई। हजारों लोग सीमाप्रान्त में युद्ध करते हुए मारे गये। सैकड़ों लोगों की सम्पत्ति जप्त कर ली गई। यह उल्लेखनीय है कि यह आन्दोलन सन् 1947 तक किसी न किसी रूप में चलता रहा।
इसी प्रकार का एक दूसरा आन्दोलन सन् 1890 के आसपास सिक्खों में शुरू हुआ, जिसका उल्लेख इतिहास की पुस्तकों में कूका आन्दोलन के नाम से पढ़ने को मिलता है। गुरू राम सिंह नामक एक  सन्त और समाज सुधारक इस आन्दोलन के नेता थे। इस आन्दोलन में सम्मलित होने वाले ब्रिटिश  सत्ता के प्रति इतनी असहयोगी भावना रखते थे कि डाकतार और रेल का भी इस्तेमाल नहीं करते थे क्योंकि इन चीजों का सम्बन्ध ब्रिटिश  सत्ता से था। हाथ के कते सूत का हाथ से बुना कपड़ा ही वे प्रयोग में लाते थे क्योंकि इंगलैण्ड में बनी मशीनों के स्पर्श     से अपवित्र हुए कपड़े का इस्तेमाल भी उनके लिए वर्जित था। पंजाब में स्थित मैणी नामक ग्राम उनका केन्द्र था, जहां आज भी बाबा राम सिंह के उत्तराधिकारी इस पन्थ की गद्दी पर बिराजमान हैं। इस आन्दोलन को भी भयानक दमन का    शिकार  होना पड़ा। गुरू रामसिंह गिरफ्तार करके मांउले मेज भेज दिये गये। बहुत से कूका सिख तोपों से उड़ा दिये और बहुत से जेलों में बन्द कर दिये गये।


वासुदेव बलवन्त फड़के
कूका सिक्खो के   दमन काल में ही सन् 1856 के आस पास नासिक में रहने वाले एक मराठा युवक वासुदेव बलवन्त फड़के के हृदय में ब्रिटिश  सत्ता के विरूद्ध क्रोधाग्नि भड़क उठी। उन दिनों भारत के कुछ क्षेत्रों में भीषण अकाल पड़ रहा था और हजारों की संख्या में लोग भूख से मर रहे थे। फड़के यद्यपि सरकारी कर्मचारी था किन्तु वह अकाल और अकाल के कारण हुई मृत्युओं का जिम्मेदार अग्रेजों का शासन मानता था। फड़के का यह भी विशवास  था कि भारत से अंग्रेजों को निकालने के बाद इस देश  में जनता द्वारा निर्वाचित सरकार की स्थापना की जाय। ऐसे विचार उसने अपनी डायरी में लेखवद्ध किये थे जो गिरफ्तारी के समय उसके पास से बरामद हुई थी। फड़के ने पहले नगर के    शिक्षित  वर्ग में अपने साथी खोजने का प्रयास किया। किन्तु उसे निराशा  हुई। तब वह गरीब किसानों  और  आदिवासियों के क्षेत्र में जा पहुंचा और सैकड़ों साहसी लोगों को संगठित कर लिया। वह अपने दल के साथ सरकारी दफ्तरों और खजानों तथा खाद्यान्न भंडारों पर धावा बोलता था और जो कुछ लूटता था वह सब अकाल पीड़ितों में बाँट देता था। कई बार उसकी पुलिस दलों से मुठभेड़ हुई किन्तु उसे जीवित या मृत पकड़ा नहीं जा सका। इस पर बम्बई सरकार ने उसके लिये कई हजार रूपये के इनाम की घोषणा की। इसके जबाब में फड़के ने बम्बई के गवर्नर का सिर लाने वाले के लिये इनाम की घोषणा की और इस घोषणा के पोस्टर उसने जगह जगह लगवा दिये। अन्त में बड़ी कठिनाई से फड़के को गिरफ्तार किया जा सका। गिरफ्तारी के समय उसे तेज बुखार था और एक मंदिर में अकेला पड़ा हुआ था। फड़के पर मुकदमा चला और उसे अदन भेज दिया गया। एक बार अदन की जेल से भी भागने में सफल हो गया, लेकिन उस अनजाने देश  में वह फिर पकड़ लिया गया और उस जेल में ही कुछ समय बाद उसका देहान्त हो गया।
जब फड़के की गतिविधियां चल रही थी तब ई.पी. मिनाएव नामक एक रूसी विद्वान भारत आया था और उसने अपने यात्राओं का विवरण पुस्तक रूप में  प्रकाशित   किया है। मिनाएव ने अपनी पुस्तक में फड़के का भी उल्लेख किया है और उसकी जीवन कथा तथा मुकदमे के विवरण में अपनी रूचि प्रकट की है। इससे  समझा जा सकता है कि फड़के को उस समय कितनी प्रसिद्धी मिली होगी।

लार्ड मेयो की हत्या
इन दिनों ही अन्डमान में भारत के बायसराय लार्ड मेयो की हत्या शेर अली नामक एक पठान कैदी ने कर दी।  कुंवर मुहम्मद अशरफ जैसे प्रामाणिक इतिहाज्ञों का कथन है कि लार्ड मेयो की हत्या का षड़यंत्र उन बहावी  मौलवियों द्वारा रचा गया था, जो पटना के अत्यन्त सम्पन्न परिवार के थे और सीमा प्रान्त स्थिति विद्रोही केन्द्र के सहायक होने के कारण उस समय अण्डमान में आजीवन कारावास का दंड भुगत रहे थे। यह भी एक बड़ी राजनीतिक घटना थी।

महर्षि दयानन्द सरस्वती
इसी समय देश  में महर्षि दयानन्द सरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ और उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। कुछ आर्य समाजी विद्वानों ने पिछले कुछ समय से ऐसे लेखादि लिखने प्रारम्भ किये हैं जिनमें यह स्थापना की गई है कि महर्षि दयानन्द सरस्वती तथा उनके गुरू स्वामी विरजानन्द जी का सन् 1857 के विद्रोही नेताओं से सम्बन्ध था। अभी इस स्थापना को इतिहासज्ञों ने पूरी तरह मान्यता नहीं दी है। फिर भी महर्षि ने अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाष में यह लिखकर कि  विदेशी    शासन चाहे कितना ही न्यायप्रिय और प्रजावत्सल हो, अपने राज्य से उत्कृष्ट नहीं हो सकता, स्पष्ट कर दिया है कि वे भारत में ब्रिटिश  शासन के विरोधी थे। अतः सम्भव   है   कि महर्षि दयानन्द सरस्वती सन् 1857 के विद्रोह से सम्बन्धित रहे हों। इतना तो   निशचित   है कि आर्य समाज के अनेक प्रसिद्ध नेता और कार्यकर्ता देश  की आजादी की लड़ाई में अग्रगन्य रहे। इनमें से स्वामी श्रद्धानन्द और लाला लाजपत राय का नाम हम सभी जानते हैं और काकोरी केस में फांसी पाने वाले चार शहीदों में से दो श्री रामप्रसाद  विस्मिल और ठाकुर रोशन सिंह भी आर्य समाज के द्वारा ही राष्ट्र सेवा की ओर आकर्षित हुए थे, यह एक प्रामाणिक तथ्य है l  इस प्रकार आर्य समाज आन्दोलन ने भी राष्ट्र के स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया है इसे स्वीकार किया जाना चाहिए।
आर्य समाज की ही भांति उन दिनों प्रार्थना समाज, ब्रह्म समाज जैसी संस्थायें भी स्थापित हुई। यह  धार्मिक संगठन थे किन्तु इनके माध्यम से कुछ महानुभाव एक स्थान पर एकत्रित होकर देश  समाज एवं जाति की समस्याओं पर विचार विनिमय करें ऐसी पद्धति का प्रचलन हुआ। इससे सार्वजनिक जीवन  का विकास हुआ और स्वतंत्र चिन्तन प्रारम्भ हुआ, इसलिए इन संस्थाओं की रचना उल्लेखनीय है।
इन दिनों ही कुछ राज्यों में ऐसी संस्थायें भी संगठित हुईं जो प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक थीं। उदाहरण के लिए बंगाल में श्री सुरेद्रनाथ बनर्जी के प्रयास से इंडियन एसोशिएसन  की स्थापना हुई थी। इन संस्थाओं के द्वारा भारतीय जनता के नागरिक अधिकारों पर विचार किया जाने लगा था। भारतीय शासन पद्धति में सुधार के लिए सुझाव दिये जाने लगे थे। कभी कभी अत्यन्त नम्र शब्दों में किसी सरकारी नीति की आलोचना भी कर दी जाती थी लेकिन इसके साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया जाता था कि हम पूरी तरह राजभक्त हैं और ब्रिटिश  शासन को भारत के लिए कल्याण प्रद मानते हैं। इस समय तक ऐसी पत्र पत्रिकायें भी देश  में निकलने लगी थीं, जिनका संचालन भारतीयों के हाथ में था। उस समय पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन व्यापार नहीं था, बल्कि  देश  सेवा  और संकटों को आमंत्रण देना था। अंग्रेजों और ऐग्लोइंडियनों द्वारा संचालित पत्रों और भारतीयों द्वारा संचालित पत्रों में प्रायः विवाद प्रारम्भ हो जाते थे, क्योंकि दोनों प्रकार के    पत्रों  के दृष्टिकोणों में भारी अन्तर था। अंग्रेजों और एंग्लोइंडियनों के पत्र उन भारतीयों के प्रति प्रायः विष उगलते रहते थे जो शासन व्यवस्था की आलोचना करने का साहस करते थे। अंग्रेजों के पत्रों का रूख लगभग ऐसा था कि यदि भारतीय कुछ चाहते हैं तो उनको भिखारियों और दासों की भाषा में गिड़गिड़ाते हुए मांगना चाहिए और अधिकार तथा कानून की बात नहीं करनी चाहिए।
आर्य समाज ब्रह्म समाज और प्रार्थना समाज जैसी संस्थाओं ने भारतीयों के मनोबल को ऊँचा किया और उन्होंने अनुभव किया कि उनका अतीत ऐसा शानदार रहा है, जिस पर वे उचित गर्व कर सकते हैं। इसके अन्तर्गत ऐसी भावना भी विद्यमान थी कि अंग्रेज जाति यद्यपि इस समय सत्ता में है और विशव्  में उसे   सर्वाधिक शक्तिशाली माना जाता है। आध्यात्मिक क्षेत्र में, संस्कृति तथा साहित्य में वह इस समय भी भारतीयों के समकक्ष नहीं है। और भारतीय प्रयास करने पर पुनः उनसे अधिक उन्नतिशील हो सकते हैं। स्वामी रामकृष्ण, परमहंस, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, महादेव गोविन्द रानाडे, रामकृष्ण भंडार कर जैसे भारत के सुपुत्रों को यह श्रेय प्राप्त है कि उन्होंने अपनी विद्वता कर्मठता और निर्भीकता से भारतीयों के हृदय में श्रेष्ठत्व की इस भावना का संचार किया। राजा राम मोहन राय इससे पहले पीढ़ी के थे और वे भारतीय जन मानस को प्रभावित करने तथा झकझोरने में अपने जीवन के अमूल्य वर्षो को समर्पित कर चुके थे। मुसलिम समाज में यह कार्य शाहवलीउल्ला और उनके पुत्र शाह अब्दुल्ला अजीत ने किया था यद्यपि उनका दृष्टिकोण इनसे भिन्न था।
भारतीयों में व्याप्त इस नव जागरण का परिणाम यह हुआ कि उस समय शासन द्वारा अंग्रेजों और भारतीयों के बीच जो भेदभाव पूर्ण व्यवहार किया जाता था, उसका विरोध करने लगे।  भारतीयों की इस भावना को मान्यता देते हुए ही सन् 1883 में वाइसराय लार्ड रिपन की कौंसिल के एक सदस्य लार्ड इलबिर्ट ने  एक बिल पेश  किया, जिसके अनुसार भारतीय मजिस्ट्रेट भी फौजदारी के मुकदमें से सम्बन्धित अंग्रेज अभियुक्तों को दंड दे सकते थे। इस बिल का भारत स्थित अंग्रेजों और एंग्लोइंडियनों  ने  इतना घोर विरोध किया कि इलवर्ट को यह बिल वापस लेना पड़ा। बताया जाता है कि इस बिल के प्रति भारत स्थित अंग्रेजों की भावना     इतनी  उग्र थी कि उन्होंने वायसराय को जबरदस्ती एक जहाज में डालकर इंगलैण्ड भेज देने का     षड़यंत्र  भी रचा था। इस बिल काण्ड  ने  उस समय भारतीयों और अंग्रेजों के मध्य भीषण कटुता पैदा  कर दी थी जिसके परिणाम स्वरूप कुछ भारतीयों ने गुप्त समितियां बनाकर अंग्रेजी सत्ता को शस्त्र बल से हटाने की दिशा  में विचार करना प्रारम्भ कर दिया था। ऐसी ही समितियों ने आगे चल कर भारत में विल्पवी आन्दोलन को जन्म दिया जिसके कारण हजारों भारतीय शहीद हुए।

काँग्रेस की स्थापना
उस समय भारत में कुछ उदारवादी दृष्टिकोण के अंग्रेज इस परिस्थिति को बड़ी चिन्ता की दृष्टि से देख रहे थे। इन अंग्रेजों में एक थे मि. ह्यूम, जो सन् 1857 की क्रान्ति के खूनी दिनों में उत्तर प्रदेष के एक जिले में कलक्टर थे। कहा जाता है मि. ह्यूम को ऐसी सूचनायें प्राप्त हुई थीं जिनके अनुसार भारत में एक भीषण विद्रोह पुनः प्रारम्भ होने वाला था। यह सूचनायें सात बड़ी पुस्तकों में संग्रठित थीं और इनमें भारत के प्रत्येक प्रान्त और प्रत्येक जिले की ऐसी     हलचलों का       विवरण  था। ह्यूम की चिन्ता इस जानकारी से और भी बढ़ गई। उन्होंन तत्कालीन वायसराय से मंत्रणा की। ह्यूम का विचार था कि भारत के प्रतिभाशाली और देशभक्त नागरिक यदि एक मंच पर एकत्रित तो कर सरकार को यह बताते रहे कि भारतीय क्या चाहते हैं तो भारतीयों के  ह्रदय  में अंग्रेजों के प्रति ऐसा विशवास उत्नन्न हो सकता है कि वे वैध रूप में भी अधिकार प्राप्त कर सकते हैं। इससे भारतीयों के हृदय में उत्पन्न होती जा रही विद्रोही प्रवृत्ति पर अंकुष लगेगा और इससे सरकार को सुविधा होगी।
इसी विचार के अनुसार सन् 1885 में बम्बई में कांग्रेस की स्थापना की गई। सरकारी क्षेत्रों में भी इस संस्था की स्थापना का ऐसा उत्साहपूर्ण स्वागत किया गया कि जब सन् 1886 में कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन श्री दादा भाई नौरोजी की अध्यक्षता में कलकत्ता में हुआ तो तत्कालीन वायसराय लार्ड उफरिन की ओर से अधिवेशन में पधारने वाले सभी प्रतिनिधियों को     प्रीतिभोज  दिया गया था। कांग्रेस के तीसरे अधिवेशन में भी मद्रास के तत्कालीन गवर्नर ने स्वतः उपस्थित होकर इस संस्था की स्थापना को सरकार के अनुकूल तथा समर्थित सिद्ध किया था। किन्तु कांग्रेस का चौथा अधिवेशन जब इलाहाबाद में संयोजित किया गया तो स्थिति दूसरी थी। सरकार की ओर से प्रयास किया गया कि  कांग्रेस का अधिवेशन हो सके ऐसा कोई स्थान कांग्रेसजन प्राप्त न कर सकें। पंजाब में हजारों लोगों से ऐसी जमानत तलब की गई कि वे कांग्रेस अधिवेशन में सम्मिलित नहीं होंगे। फिर भी अधिवेशन हुआ और इसे साधारण जनता ने कांग्रेस की सरकार पर विजय के रूप में ग्रहण किया। कहा जा सकता है कि यहीं से कांग्रेस और ब्रिटिश  सरकार में परस्पर विरोध उत्पन्न हुआ।
इसी युग में भारत के सार्वजनिक जीवन में दो ऐसे महान् पुरूषों का प्रादुर्भाव हुआ, जिनके विचार एक दूसरे के सर्वथा विपरीत थे। यह दो व्यक्ति थे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, जो सरकारी की नीतियों    की  कठोर आलोचना करते थे और दूसरे थे सर सय्यद अहमद खां, जो अंग्रेजों के राज को भारत के लिये सौभाग्य और वरदान का विषय मानते थे। दोनों ही महानुभाव परम विद्वान और अत्यधिक प्रभावशाली थे। दोनों ने ही देश  और जाति की सेवा के लिये अपने को समर्पित कर दिया था। स्वभावतः तिलक को भारत की हिन्दू जनता में अभूतपूर्व लोक प्रियता प्राप्त हुई। यद्यपि भारत के सहस्त्रों मुसलमान जिनमें एक श्री मुहम्मद अली     जिन्ना  भी थे, तिलक के पूर्ण रूप से भक्त थे। सर सय्यद मुसलमानों के अभिजात्य वर्ग में, नबाबों और रईसों में विशेष प्रभाव रखते थे। अलीगढ़ में मुसलिम विश्व  विद्यालय की स्थापना कर उन्होंने मुसलमानों में और भी लोक प्रियता प्राप्त कर ली थी। यह कहा जा सकता है कि आगे चलकर भारत का जो विभाजन हुआ और पाकिस्तान का निर्माण हुआ उसके बीज इसी समय भारतीय राजनीति में पड़े। आशचर्य की बात केवल यह है कि पाकिस्तान आन्दोलन के    नेतृत्व का श्रेय  जिन्ना को प्राप्त हुआ जो उस समय उस इस प्रकार के विचारों के घोर विरोधी थें
 19 वीं शताब्दी के अन्तिम वर्षो में भारतीय राजनीति इस रूप में आ गई थी कि कुछ उत्साही युवक देशभक्ति का जयघोष करते हुए फांसी पर चढ़ने लगे थे और तिलक जैसे नेता सरकारी नीतियों का उग्र विरोध करते हुए जेलजाने लगे थे।   विदेशी  सत्ता के विरूद्ध लड़ाकू राजनीति का या कहना चाहिए लड़ाकू जन आन्दोलनों का सूत्रपात 19वीं शताब्दी के अन्त तक हमारे देश  में हो चुका था। इसके बाद की कहानी बहुत घटना पूर्ण और इससे अधिक  विस्तृत है।
   (यह आलेख स्व. श्री रतन लाल बंसल का १९८० में एक सभा में दिया गया अप्रकाशित भाषण है l फिरोजाबाद निवासी श्री बंसल ने स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लिया और जेल भी गए l उन्होंने ३७ पुस्तके लिखी l ''तीन क्रन्तिकारी शहीद '' और रेशमी पत्रों का षड़यंत्र '' पुस्तकें अंग्रेजी जमाने में प्रतिबंधित हुईं ल स्व. श्री बंसल भारत में अंग्रेजी राज के लेखक प. सर सुन्दर लाल के साथ रहे .आजादी के बाद कौमी एकता के लिए जीवन भर काम किया. प. बनारसी दस चतुर्वेदी के साथ क्रान्तिकारियो के परिजनों के लिए सुख सुविधा जुटाने के साद कार्य में रूचि लेते रहे . यह लेख आजादी के आन्दोलन   की एक झलक है और उसके  असल चरित्र को समझने में मदद करता है l )

1 comment:

  1. this article is thought provoking.

    Dr. R.K. CHATURVEDI

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